डायरी का एक कोरा पन्ना हमेशा के लिए ख़ाली रह गया
अधूरी बातों संग यादों का सिलसिला आज भी ज़ारी है,
पन्ने पलट कर पूछते हैं, पन्ने का ख़ाली होने का सबब
क्या कहूँ कि ज़िंदगी की कश्मकश में मुश्क़िलें बाक़ी हैं,
सोचा था तुम्हारी मोहब्बत से पन्ने को बाखूबी सजायेंगे
चाहत के चंद अल्फ़ाज़ लिखना, सनम अभी बाक़ी है,
पूरी न हो सकेगी अधूरी चाहत को पाने की कोशिश मेरी
इश्क़ की चाहत लिए, ख़्यालों में भटकना मेरा ज़ारी है,
दिन रात एक यही रोग, न मरने दे और न कहीं जीने दे
तुम्हें पा लेने की, नाक़ाम कोशिश मेरी, अभी ज़ारी है,
काश!कह लेते तुम, चंद लफ़्ज़, उन चंद मुलाक़ातों में
अधूरी ख़्वाहिशों की चाह में, जलना मेरा अभी ज़ारी है,
दिल के सुलगते ज़ख़्मों, फफोलों को हाथों से सहला दो
जाने कितने नासूरों का, चाहत से भरना अभी बाक़ी है,
दिल की कलम से उस कोरे पन्ने पर, लिख देते नाम मेरा
तुम्हारे दिल पर अपना नाम, पढ़ना मेरा अभी बाक़ी है....