दुनिया की झूठी रस्मों ने, तोड़ दिया मेरा अंतर्मन
क्या निभाए कैसे निभाए, इसी में फंस गया मन,
चेहरा एक मुखौटे कई, असली को पहचाने कौन
तन्हा जीवन ही बढ़िया है, तू भी मौन मैं भी मौन,
ज़माने के रंग ढंग में, अपनी जड़ें संस्कार भूल गए
अपने पराये का भेद बहुत, इंसानियत भी भूल गए,
इस रंग बदलती दुनिया ने आहत किया मेरा मन
कैसे भूलें, कितना तोड़ा और कुचला गया मेरा मन,
कोई नहीं अपना यहाँ, परायों जैसे अपने यहाँ
सिर्फ़ मरने पर फूँकने आते, पराये जैसे अपने यहाँ,
दुःखी हूँ हारी नहीं, गिरगिटों से भरी दुनिया में
बस लगता नहीं मन, रंग बदलती झूठी दुनिया में।