रविवार, 12 जुलाई 2026

तौहीन

लम्हा दर लम्हा, हर पेश लम्हा

तुम हमेशा, तौहीन करते रहे, 


किसने हक़ दिया तुम्हें ऐसा करो

बेइज़ाज़त तुम तौहीन करते रहे, 


नामालूम सी कोशिशें तुम्हारी 

बीते हर वक़्त, तौहीन करते रहे, 


ज़हर चाशनी में घोल पेश कर

नसों से, जिस्म में उतारते रहे, 


मालूम था, ज़हर पीना ही पड़ेगा

तुम्हारी जान का सदका करते रहे, 


बेवक़्ती मौत मुक़र्रर कर चुके तुम

मोहब्बत का झूठा दम भरते रहे, 


न रोकेंगे अब आकर राह तुम्हारी

बेखौफ़ बेमतलब हम भटकते रहे।

एक बात बोलूँ

न मालूम थी ग़ैरों की फ़ितरत, बिल्कुल अन्जान थे 

रहे सूरत तक ही सीमित, सीरत से जो बेईमान थे, 


न थी कोई ग़लती, न था कभी कोई अपना क़सूर

यकीन दिला कर हारे, थे कितने मज़लूम बेक़सूर, 


न थी दुनिया की ख़बर, न सीखी कभी दुनियादारी

नसों में दौड़ती रही हमेशा सिर्फ़ और सिर्फ़ वफ़ादारी, 


न किसी ने यकीन किया, न मुश्क़िलों में साथ दिया

वफ़ा का सिला बेवफ़ाई की तोहमत लगा कर दिया, 


न जाने देते उसे तो भी, रोकने की कोई वज़ह न थी

वैसे भी उसके दिल में अपनी कहीं कोई जगह न थी, 


न पछतावा है न गिला न शिकवा कोई ख़ुदा से रहा

काँटों भरी राहों पर, वास्ता सिर्फ़ उस ख़ुदा से रहा, 


न दुनिया की परवाह मुझे, दुनिया से कोई चाहत नहीं

लोग भिखारी सभी यहाँ, उनसे कभी कोई राहत नहीं, 


न गिरने दिया, अपने हाथों में, गिरते ही संभाल लिया

एक बात बोलूँ, दुनिया से ज़्यादा ख़ुदा ने संभाल लिया।

इन दिनों ये किस्सा सरेआम हो गया

मुस्कुराता घर, ख़ाली मकान हो गया, 


नाज़ों से खरीदी थी बेशुमार ख़ुशियाँ

बीतते समय संग, बेजान सामान हो गया, 


जलते थे दीये, मनाते रहे त्योहार जहाँ

काले साये, घोर अंधेरों का घर हो गया, 


न लौटेंगे वो दिन न वापस आयेंगे लोग

वक़्त का सितम, क्या से क्या हो गया, 


खिलखिलाती हँसी, सजती रौनकें जहाँ

वो ज़िंदा घर अब इक श्मशान हो गया।

ये दुनिया

जितना समेटना चाहूँ, उतनी बिखरती जाती है

लाख कोशिश करूँ, जाने मुझसे क्या चाहती है, 


ये ज़िंदगी है या मज़ाक कोई, नहीं समझ आता

ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर बेखौफ़ चलती जाती है,


तन्हाई के सिवा कुछ पास नहीं, न कोई हमदर्द यहाँ

दुनिया की भीड़, ज़ख़्मों पर नमक लगाती जाती है, 


कैसे हैं लोग, ज़िंदा को ग़ाली, मुर्दे को सहारा देते हैं

अजीब यहाँ की रस्में हैं, क्यों ऐसे निभायी जाती हैं,


मुसीबतों में एहतियात से, बच कर निकल जाते हैं

मरने पर ये दुनिया 'राम नाम सत्य' कहती जाती है, 


क्या करना ऐसे लोगों का, जीते जी मारते इंसां को

भलाई करने पर भी ये दुनिया, क्यों कोसती जाती है, 


बेहतर नहीं बहुत अच्छी, ये तन्हाई सच्ची लगती है

यहाँ मक्कारों की दुनिया में, अच्छाई मरती जाती है,


पहेली है ज़िंदगी, आसानी से कभी न सुलझ पायेगी 

बचकर चलते रहो, ये दुनिया रोते को और रुलाती है।

आस

कैसे कह दूँ ज़माने से कि आज भी तुमसे प्यार नहीं है, 

इन आँखों को बेसब्री से अब भी तुम्हारा इंतज़ार नहीं है, 


सात जन्मों के लिए बँधी तुमसे, ये बंधन हमेशा रहेगा

तुम्हारा प्यार मेरे साथ, हमेशा सात जन्मों संग रहेगा, 


अब तुम पास नहीं, ये जन्म मिलन अपना हो न सकेगा

आत्मा से कभी अलग नहीं, अनुराग यूँ न छूट सकेगा, 


तुम्हारी निशानी, अंश तुम्हारा, बाल रूप सदा मेरे पास

फ़िर क्यों न तुम्हें तड़पो, जान ओ जिगर तुम्हारा मेरे पास, 


तुम बिन हर रौनक उदास, सारी रोशनी फ़ीकी लगती हैं

कभी कभी, कहीं दूर, एक उम्मीद कुछ जागी लगती है, 


दिख जाओ तुम कहीं, तुम्हारे आने की सूरत दिखाई दे

बस इक झलक, किरण कहीं कोई, अँधेरे में दिखाई दे, 


हर जनम का संग हमारा, यूँ मिलन अधूरा क्यों बाक़ी रहे

हम साथ निभाते एक दूजे का, नामोनिशां हमारा बाक़ी रहे, 


अपनी चाहतों का घरौंदा, प्यार से एक बार फ़िर बनाएंगे

खुले आसमाँ के नीचे, सारी रस्में एक बार फ़िर निभायेंगे, 


सुख हो या दुःख की हों हवाएं, मिलकर हम सामना करेंगे

घबराना नहीं तुम हाथ थामे रखना, मुश्क़िलें हम दूर करेंगे, 


ये जन्म साथ इतना ही, बहुत कम मुश्क़िलों से भरा रहा

मग़र जितना भी रहा, बहुत प्यारा, मोहब्बत से भरा रहा, 


अगले जन्म प्यार की उम्र थोड़ी ज़्यादा लिखवा कर लाना

कहानी अपनी चाहतों की खत्म न हो, लिखवा कर लाना।


क्यों???

तुम ही से मेरा चाँद खिले


तुम ही से सुबह हो मेरी

तुम ही से चांदनी मिले, 


तुम ही से महके हर कली

तुम ही से मेरी शाम ढले, 


तुम ही तो अपने हो मेरे

तुम ही से हर फूल खिले, 


तुम ही तो चाहत हो मेरी

तुम ही से हैं मेरे सारे गिले, 


तुम ही से ज़िन्दगी है मेरी

तुम ही से मेरा दिल मिले, 


तुम ही से हैं सारे सिलसिले

जब तुम से सब कुछ मिले


फिर क्यों न मुझे तुम मिले?


मन जब हल्का हो जाता है

 किसी कोने में बैठ, कुछ आँसू बहा कर

दुःख दर्द भरा मन जब हल्का हो जाता है, 


सही कहूँ, किसी से मन खोलना नहीं पड़ता

कष्टों से भरा भारी मन, हल्का हो जाता है, 


कह लेने, सुनने की भी बड़ी कीमतें यहाँ पर

काग़ज़ पर उकेरने से, मन हल्का हो जाता है, 


कंटीली बातों के घावों से ज़ख़्मी दुःखी मन 

लिखने के मरहम से, कुछ हल्का हो जाता है, 


मतलब की दुनिया, मतलबी लोग भरे सब ओर

अपने मन को गूढ़ने से, बोझ हल्का हो जाता है, 


किससे कहें, कौन सुने, गूँगे बहरों का संसार

अपना ग़म ख़ुद ही सहने से, हल्का हो जाता है, 


जब कोई राह दिखाई न दे, कुछ हल भी न सूझे

प्रभु से प्रार्थना करने से, दुःख हल्का हो जाता है।


शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

हम फ़िर मिलेंगे

हम दूर हुए तो क्या, फ़िर मिलेंगे

राहें जुदा हुई, मग़र फ़िर मिलेंगे, 


भरोसा है मुझे, हम फ़िर मिलेंगे

तुम इंतज़ार करना मेरा, मिलेंगे, 


कुछ पल की जुदाई है, कुछ नहीं

यकीन करो, हम तुम फ़िर मिलेंगे, 


जुदाई में तुम, कभी आँसू न बहाना

प्यार सच्चा है ग़र, हम फ़िर मिलेंगे, 


क़िस्मत की कलम से मिलना लिखा

दुःखी न होना कभी, हम फ़िर मिलेंगे। 


हक़ है मुझे कि

हक़ है मेरा कि तुम्हारे नाम का श्रृंगार करूँ

हर रूप हर रंग का, बहुत सुंदर श्रृंगार करूँ, 


सृष्टि ने सृजन किया, यहाँ तेरे मेरे प्यार का

खुलकर मैंने स्वागत किया, तेरे मेरे प्यार का, 


तुमसे ये पवित्र बंधन, हे प्रिय स्वीकार मुझे

तुम्हारा दिया, हर उपहार है अंगीकार मुझे, 


तुमसे मेरा सिंदूर बिंदिया, चेहरे की चमक

तुम्हारे प्यार से क्यों न आये चेहरे पर दमक, 


तुम्हीं जीवनसाथी हर जनम मुझे मिलना

ये अधूरा रहा, अब थोड़ा जल्दी मिलना।


कौन अपना हुआ

दर्द की इंतेहा में यहाँ, कब कौन अपना हुआ

तड़पते पुकारते रहे मग़र कोई अपना न हुआ, 


अपनों को पुकारा, परायों से भी फ़रियाद की

इस बेदर्द ज़मानें में, कहीं कोई अपना न हुआ, 


भरी दुनिया में अपना कहने को कहीं कोई नहीं

किसे याद करें, है कौन यहाँ जो पराया न हुआ, 


लोगों की भीड़ भरी यहाँ तहाँ, जिधर भी देखो

स्वार्थी मतलबी दुनिया में, कोई अपना न हुआ, 


अपनों की चाह यहाँ, उनके बिना जीना व्यर्थ

क्या करें कोई नहीं, कोई भी अपना न हुआ, 


सबके साथ चलना चाहा, दिल से निभाया भी

अफ़सोस, अच्छाई से भी कोई अपना न हुआ, 


छोड़ दिया अब, आस लगाना, उम्मीद करना

किसे सुनाएँ अपने दिल की, कोई अपना न हुआ।


कुछ अधखुले ग़ुलाब

कुछ ग़ुलाब अधखुले, आज भी किताबों में

सूखे मुरझाये, अब भी ख़ुशबू बिखेर रहे हैं, 


कभी दो अजनबी पहली बार यहाँ मिले थे

तेरी मेरी मुलाक़ातों की कहानी कह रहे हैं, 


रोज़ मुस्कुराने का, एक नया बहाना देते हैं

जब भी किताब खोल देखो, कुछ कह रहे हैं, 


प्यार का इज़हार हुआ था कभी, ये कहते हैं

बेपनाह बेमिसाल चाहत की बात कह रहे हैं, 


पंखुड़ियाँ बिखर गयीं फूल से, प्यार वही है

मेरी मोहब्बत को हर रोज़, मुझे सुना रहे हैं।


वो चुभती यादें

तुम्हारे जाने के बाद सोचता हूँ कैसे जी पाऊँगा मैं

तुम्हारी हर बात यादें बन हर लम्हा बहुत सताती है, 


साथ जीने साथ मरने की कसमें खाईं थी हमने

मग़र अकेलापन, तुम्हारी यादें मुझे बहुत सताती हैं, 


वापस न आओगी तुम, ये जानता हूँ मैं भी मग़र

दिल को तुम्हारी मुस्कुराहट, याद आ बहुत सताती है, 


दिल धड़कना तुम्हारे जाने के बाद अब भूल गया है

आने की उम्मीद जाग कर, मुझे बहुत सताती है, 


लाख कोशिश करूँ बेशक़, दिन रात आँसू बहाऊँ

न आओगी तुम, ये बात दिल तोड़, बहुत सताती है, 


काश उसी राह पर चलकर, मैं तुम तक पहुँच पाता

अफ़सोस तन्हा जीना होगा, ये बात बहुत सताती है, 


लौट आओ तुम बिन मैं, तन्हा बेचैन जी न पाऊँगा

वो चुभती यादें अक्सर याद आ, बहुत सताती हैं।


भूल गई सब

क्या दिन क्या रात, क्या सुबह क्या शाम

कब आये तीज त्योहार, मैं भूल गई सब, 


तेरी यादों में खोई इस क़दर, याद नहीं कुछ

कब बीते पहर दर पहर, मैं भूल गई सब, 


भूली अपनी सुध-बुध, याद तुम्हारी याद मुझे

अपनी कोई फ़िक्र नहीं, ऐसे भूल गई सब, 


कौन मुझे पुकारे, सुनना मुझे अब याद नहीं

कानों में गूँजे तुम्हारी बातें, और भूल गई सब, 


राहों पर नज़र रोक, पदचाप तुम्हारी ढूंढ़ रही

सूनी राहें, उदास मन, ऐसी डूबी भूल गई सब,


तन मिट्टी, मन तुम्हारा, मुझमें मेरा कुछ नहीं

तुमसे मिलने की आस में, बाक़ी भूल गई सब।

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

तोड़ दिया मेरा अंतर्मन

दुनिया की झूठी रस्मों ने, तोड़ दिया मेरा अंतर्मन

क्या निभाए कैसे निभाए, इसी में फंस गया मन, 


चेहरा एक मुखौटे कई, असली को पहचाने कौन

तन्हा जीवन ही बढ़िया है, तू भी मौन मैं भी मौन, 


ज़माने के रंग ढंग में, अपनी जड़ें संस्कार भूल गए

अपने पराये का भेद बहुत, इंसानियत भी भूल गए, 


इस रंग बदलती दुनिया ने आहत किया मेरा मन

कैसे भूलें, कितना तोड़ा और कुचला गया मेरा मन, 


कोई नहीं अपना यहाँ, परायों जैसे अपने यहाँ

सिर्फ़ मरने पर फूँकने आते, पराये जैसे अपने यहाँ, 


दुःखी हूँ हारी नहीं, गिरगिटों से भरी दुनिया में

बस लगता नहीं मन, रंग बदलती झूठी दुनिया में।


एक बात बोलूँ....

तुम बिन जीने की कोशिश में तुमसे नाराज़ भी हुए

मग़र एक बात बोलूँ, जीना मुश्क़िल है तुम्हारे बिना, 


शायद तुम्हें यकीन न हो लेकिन, यकीन करना मेरा

साँसें अटकती हैं, घुटन होती है यहाँ, तुम्हारे बिना, 


ग़र जाना ही था तो, मुझे भी अपने साथ लेकर जाते

हर तरफ़ अँधेरा और मायूसी फ़ैली है तुम्हारे बिना, 


तुम्हारे सिवा कोई नहीं, कैसे बताएं कितनी बेचैनी 

ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं खुशियाँ बेमानी, तुम्हारे बिना, 


बेशक़ बहारें आयेंगी चमन में, पतझड़ मेरे मन में

गुलशन मुरझाया, मुस्कुराना भूल गए तुम्हारे बिना, 


जाने कितनी बातें कितने एहसास अनकहे रह गये

बेपनाह मोहब्बत तुमसे, कुछ नहीं, तुम्हारे बिना।