गुरुवार, 2 जुलाई 2026

एक बात बोलूँ....

तुम बिन जीने की कोशिश में तुमसे नाराज़ भी हुए

मग़र एक बात बोलूँ, जीना मुश्क़िल है तुम्हारे बिना, 


शायद तुम्हें यकीन न हो लेकिन, यकीन करना मेरा

साँसें अटकती हैं, घुटन होती है यहाँ, तुम्हारे बिना, 


ग़र जाना ही था तो, मुझे भी अपने साथ लेकर जाते

हर तरफ़ अँधेरा और मायूसी फ़ैली है तुम्हारे बिना, 


तुम्हारे सिवा कोई नहीं, कैसे बताएं कितनी बेचैनी 

ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं खुशियाँ बेमानी, तुम्हारे बिना, 


बेशक़ बहारें आयेंगी चमन में, पतझड़ मेरे मन में

गुलशन मुरझाया, मुस्कुराना भूल गए तुम्हारे बिना, 


जाने कितनी बातें कितने एहसास अनकहे रह गये

बेपनाह मोहब्बत तुमसे, कुछ नहीं, तुम्हारे बिना।


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