शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

कुछ अधखुले ग़ुलाब

कुछ ग़ुलाब अधखुले, आज भी किताबों में

सूखे मुरझाये, अब भी ख़ुशबू बिखेर रहे हैं, 


कभी दो अजनबी पहली बार यहाँ मिले थे

तेरी मेरी मुलाक़ातों की कहानी कह रहे हैं, 


रोज़ मुस्कुराने का, एक नया बहाना देते हैं

जब भी किताब खोल देखो, कुछ कह रहे हैं, 


प्यार का इज़हार हुआ था कभी, ये कहते हैं

बेपनाह बेमिसाल चाहत की बात कह रहे हैं, 


पंखुड़ियाँ बिखर गयीं फूल से, प्यार वही है

मेरी मोहब्बत को हर रोज़, मुझे सुना रहे हैं।


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