शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

कौन अपना हुआ

दर्द की इंतेहा में यहाँ, कब कौन अपना हुआ

तड़पते पुकारते रहे मग़र कोई अपना न हुआ, 


अपनों को पुकारा, परायों से भी फ़रियाद की

इस बेदर्द ज़मानें में, कहीं कोई अपना न हुआ, 


भरी दुनिया में अपना कहने को कहीं कोई नहीं

किसे याद करें, है कौन यहाँ जो पराया न हुआ, 


लोगों की भीड़ भरी यहाँ तहाँ, जिधर भी देखो

स्वार्थी मतलबी दुनिया में, कोई अपना न हुआ, 


अपनों की चाह यहाँ, उनके बिना जीना व्यर्थ

क्या करें कोई नहीं, कोई भी अपना न हुआ, 


सबके साथ चलना चाहा, दिल से निभाया भी

अफ़सोस, अच्छाई से भी कोई अपना न हुआ, 


छोड़ दिया अब, आस लगाना, उम्मीद करना

किसे सुनाएँ अपने दिल की, कोई अपना न हुआ।


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