दर्द की इंतेहा में यहाँ, कब कौन अपना हुआ
तड़पते पुकारते रहे मग़र कोई अपना न हुआ,
अपनों को पुकारा, परायों से भी फ़रियाद की
इस बेदर्द ज़मानें में, कहीं कोई अपना न हुआ,
भरी दुनिया में अपना कहने को कहीं कोई नहीं
किसे याद करें, है कौन यहाँ जो पराया न हुआ,
लोगों की भीड़ भरी यहाँ तहाँ, जिधर भी देखो
स्वार्थी मतलबी दुनिया में, कोई अपना न हुआ,
अपनों की चाह यहाँ, उनके बिना जीना व्यर्थ
क्या करें कोई नहीं, कोई भी अपना न हुआ,
सबके साथ चलना चाहा, दिल से निभाया भी
अफ़सोस, अच्छाई से भी कोई अपना न हुआ,
छोड़ दिया अब, आस लगाना, उम्मीद करना
किसे सुनाएँ अपने दिल की, कोई अपना न हुआ।
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