रविवार, 12 जुलाई 2026

इन दिनों ये किस्सा सरेआम हो गया

मुस्कुराता घर, ख़ाली मकान हो गया, 


नाज़ों से खरीदी थी बेशुमार ख़ुशियाँ

बीतते समय संग, बेजान सामान हो गया, 


जलते थे दीये, मनाते रहे त्योहार जहाँ

काले साये, घोर अंधेरों का घर हो गया, 


न लौटेंगे वो दिन न वापस आयेंगे लोग

वक़्त का सितम, क्या से क्या हो गया, 


खिलखिलाती हँसी, सजती रौनकें जहाँ

वो ज़िंदा घर अब इक श्मशान हो गया।

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