इन दिनों ये किस्सा सरेआम हो गया
मुस्कुराता घर, ख़ाली मकान हो गया,
नाज़ों से खरीदी थी बेशुमार ख़ुशियाँ
बीतते समय संग, बेजान सामान हो गया,
जलते थे दीये, मनाते रहे त्योहार जहाँ
काले साये, घोर अंधेरों का घर हो गया,
न लौटेंगे वो दिन न वापस आयेंगे लोग
वक़्त का सितम, क्या से क्या हो गया,
खिलखिलाती हँसी, सजती रौनकें जहाँ
वो ज़िंदा घर अब इक श्मशान हो गया।
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