लम्हा दर लम्हा, हर पेश लम्हा
तुम हमेशा, तौहीन करते रहे,
किसने हक़ दिया तुम्हें ऐसा करो
बेइज़ाज़त तुम तौहीन करते रहे,
नामालूम सी कोशिशें तुम्हारी
बीते हर वक़्त, तौहीन करते रहे,
ज़हर चाशनी में घोल पेश कर
नसों से, जिस्म में उतारते रहे,
मालूम था, ज़हर पीना ही पड़ेगा
तुम्हारी जान का सदका करते रहे,
बेवक़्ती मौत मुक़र्रर कर चुके तुम
मोहब्बत का झूठा दम भरते रहे,
न रोकेंगे अब आकर राह तुम्हारी
बेखौफ़ बेमतलब हम भटकते रहे।
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