न मालूम थी ग़ैरों की फ़ितरत, बिल्कुल अन्जान थे
रहे सूरत तक ही सीमित, सीरत से जो बेईमान थे,
न थी कोई ग़लती, न था कभी कोई अपना क़सूर
यकीन दिला कर हारे, थे कितने मज़लूम बेक़सूर,
न थी दुनिया की ख़बर, न सीखी कभी दुनियादारी
नसों में दौड़ती रही हमेशा सिर्फ़ और सिर्फ़ वफ़ादारी,
न किसी ने यकीन किया, न मुश्क़िलों में साथ दिया
वफ़ा का सिला बेवफ़ाई की तोहमत लगा कर दिया,
न जाने देते उसे तो भी, रोकने की कोई वज़ह न थी
वैसे भी उसके दिल में अपनी कहीं कोई जगह न थी,
न पछतावा है न गिला न शिकवा कोई ख़ुदा से रहा
काँटों भरी राहों पर, वास्ता सिर्फ़ उस ख़ुदा से रहा,
न दुनिया की परवाह मुझे, दुनिया से कोई चाहत नहीं
लोग भिखारी सभी यहाँ, उनसे कभी कोई राहत नहीं,
न गिरने दिया, अपने हाथों में, गिरते ही संभाल लिया
एक बात बोलूँ, दुनिया से ज़्यादा ख़ुदा ने संभाल लिया।
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