रविवार, 12 जुलाई 2026

एक बात बोलूँ

न मालूम थी ग़ैरों की फ़ितरत, बिल्कुल अन्जान थे 

रहे सूरत तक ही सीमित, सीरत से जो बेईमान थे, 


न थी कोई ग़लती, न था कभी कोई अपना क़सूर

यकीन दिला कर हारे, थे कितने मज़लूम बेक़सूर, 


न थी दुनिया की ख़बर, न सीखी कभी दुनियादारी

नसों में दौड़ती रही हमेशा सिर्फ़ और सिर्फ़ वफ़ादारी, 


न किसी ने यकीन किया, न मुश्क़िलों में साथ दिया

वफ़ा का सिला बेवफ़ाई की तोहमत लगा कर दिया, 


न जाने देते उसे तो भी, रोकने की कोई वज़ह न थी

वैसे भी उसके दिल में अपनी कहीं कोई जगह न थी, 


न पछतावा है न गिला न शिकवा कोई ख़ुदा से रहा

काँटों भरी राहों पर, वास्ता सिर्फ़ उस ख़ुदा से रहा, 


न दुनिया की परवाह मुझे, दुनिया से कोई चाहत नहीं

लोग भिखारी सभी यहाँ, उनसे कभी कोई राहत नहीं, 


न गिरने दिया, अपने हाथों में, गिरते ही संभाल लिया

एक बात बोलूँ, दुनिया से ज़्यादा ख़ुदा ने संभाल लिया।

कोई टिप्पणी नहीं: