जितना समेटना चाहूँ, उतनी बिखरती जाती है
लाख कोशिश करूँ, जाने मुझसे क्या चाहती है,
ये ज़िंदगी है या मज़ाक कोई, नहीं समझ आता
ऊबड़ खाबड़ रास्तों पर बेखौफ़ चलती जाती है,
तन्हाई के सिवा कुछ पास नहीं, न कोई हमदर्द यहाँ
दुनिया की भीड़, ज़ख़्मों पर नमक लगाती जाती है,
कैसे हैं लोग, ज़िंदा को ग़ाली, मुर्दे को सहारा देते हैं
अजीब यहाँ की रस्में हैं, क्यों ऐसे निभायी जाती हैं,
मुसीबतों में एहतियात से, बच कर निकल जाते हैं
मरने पर ये दुनिया 'राम नाम सत्य' कहती जाती है,
क्या करना ऐसे लोगों का, जीते जी मारते इंसां को
भलाई करने पर भी ये दुनिया, क्यों कोसती जाती है,
बेहतर नहीं बहुत अच्छी, ये तन्हाई सच्ची लगती है
यहाँ मक्कारों की दुनिया में, अच्छाई मरती जाती है,
पहेली है ज़िंदगी, आसानी से कभी न सुलझ पायेगी
बचकर चलते रहो, ये दुनिया रोते को और रुलाती है।
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