मंगलवार, 6 जुलाई 2021

सुबह सुबह

सुबह सुबह जब उसने ली अंगड़ाई

गालों पर उसके जैसे छाई अरुणाई

आदित्य ने गालों से जुल्फ़ें सिमटाई

चहुँ और लालिमा अपनी है बिखराई

देख पवन भी उन्मुक्त गगन में मानो

उसकी ज़ुल्फ़ों की छटा ने घटा फैलाई

हैरान हूँ मैं ये सोचकर कि मालिक ने

क़ायनात् कितनी फ़ुर्सत से है बनाई

जाने क्या उसके मन में समाई और

उसने ये प्रकृति हमारे लिए बनाई

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