शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

" ख़ुशी का इज़हार "

आज इतने समय अंतराल के बाद तुमसे मिली

कैसे कहूँ, कैसे ख़ुशी का इज़हार करूँ अपनी


ज़माने की सुनती तो तुमसे कभी ना मिल पाती

अपने दिल की सुनी और फ़िर एक बार तुमसे मिली


स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि तुमसे फ़िर कभी मिलना होगा

ऐसे और इस तरह, ज़िंदगी में कभी तुमसे फ़िर सामना होगा


क्यूँ ना मिलती तुमसे मैं, मैं अर्धांगिनी तुम अर्धांग मेरे

दुनिया कुछ भी कहे लेकिन मैं हूँ तुम्हारी और तुम मेरे


क्या हाल कर लिया है, ऐसे भी कोई ख़ुद को सज़ा देता है

झुकी कमर, कलमों में सफ़ेदी, चेहरा भी थका जान पड़ता है


तुम परेशान ना हो, मैं आ गयी हूँ, फ़िर संभाल लूँगी

तुम्हारा मेरा साथ रहे, सारा दुःख अपनी झोली में समेट लूँगी


" दर्द की छुट्टी "

इस दर्द को भी कभी दर्द होना चाहिए

कम्बख्त कभी तो ये भी छुट्टी पर जाए


हर वक़्त तैनात रहता है हटता ही नहीं

बढ़ता ही रहता, कभी कम होता ही नहीं


बस चले तो इसे अनिश्चित काल के लिए

एक लंबी छुट्टी पर कहीं दूर भेज दिया जाए


ना ख़ुद चैन से रहता है ना हमें जीने देता है

सुकून एक पल को भी सीने में नहीं रहने देता है


घाव हर रोज़ नया कोई देता और पुराने कुरेदता रहता है

दिल और दिमाग़ दोनों पर हर वक़्त यही छाया रहता है


लगता है इस दर्द की शादी करवा कर गृहस्थी बसानी पड़ेगी

तभी इसे पता चलेगा, जब मुसीबत ख़ुद के गले में आ पड़ेगी


" ख़ाली कैनवास "

इस ख़ाली कैनवास पर कौन सी तस्वीर उकेर दूँ

नफ़रत या प्यार की लकीरें खींच कर चित्र बना दूँ


रंग बिखेर कर अतीत से जुड़ी यादें अंकित कर दूँ

या फ़िर वर्तमान के रंगहीन लम्हें बिना रंग बना दूँ


सुनहरे सपनों को सच कहती कोई कल्पना रंग दूँ

या भ्रम से बाहर खींचता कोई कटु सत्य सहेज लूँ


मन में उठते बैठते मनचले से ख़्वाब सजा दूँ या

ख्वाबों की कोई नई दुनिया ही रंगों से बसा दूँ


जी तो करता है कि किसी के अधूरे सपने रंग दूँ

देख जिसे ख़ुशी आ जाए चेहरे पर ऐसी दुनिया रच दूँ


" वक़्त नहीं "

वक़्त नहीं उनके पास हमारे लिए

फ़िर भी हर शाम उनका ही इंतज़ार करते हैं


हर रोज़ शाम का वक़्त सिर्फ़ तेरे ही लिए

व्यस्त हैं बहुत मग़र तेरे ही लिए ख़ाली रखते हैं


" स्याही मेरे प्रेम "

लिख रही हूँ प्रेम की स्याही से चंद शब्द तुम्हारी याद में

तुम तक पहुँच जाए मेरी चाहत की पुकार, मेरे दिल से


स्याही मेरे प्रेम की कभी कम नहीं होगी प्रियतम मेरे

चाहे हो दिन के उजाले या हो काली रात के स्याह अंधेरे


" दर्द की छुट्टी "

इस दर्द को भी कभी दर्द होना चाहिए

कम्बख्त कभी तो ये भी छुट्टी पर जाए


हर वक़्त तैनात रहता है हटता ही नहीं

बढ़ता ही रहता, कभी कम होता ही नहीं


बस चले तो इसे अनिश्चित काल के लिए

एक लंबी छुट्टी पर कहीं दूर भेज दिया जाए


ना ख़ुद चैन से रहता है ना हमें जीने देता है

सुकून एक पल को भी सीने में नहीं रहने देता है


घाव हर रोज़ नया कोई देता और पुराने कुरेदता रहता है

दिल और दिमाग़ दोनों पर हर वक़्त यही छाया रहता है


लगता है इस दर्द की शादी करवा कर गृहस्थी बसानी पड़ेगी

तभी इसे पता चलेगा, जब मुसीबत ख़ुद के गले में आ पड़ेगी


" उसके मिलने की आस "

आस उसके मिलने की मत पाल अब और ए दिल

वो नहीं है, तेरी मोहब्बत और वफ़ा के भी काबिल


बहने दे उसे उसकी रवानगी, झूठे इश्क़ और मौजों में

कभी तो आँख खुलेगी, होगा सवेरा, जागेगा अंधेरों से


मग़र तब तक तो ये खुशियाँ, ये लम्हें कई दरिया पार कर चुके होंगे

तब तुम क्या करोगे, कैसे रोकोगे, तब तक तुम सब गँवा चुके होंगे


बेहद खास, बेशकीमती थे वो पल जो तुमने ख़ुद गवां दिए

अब कैसे पाओगे वापिस, हम तो तेरी गालियाँ छोड़ दिए


अब यूँ हाथ ना मलो, कुछ काम ना आयेगा, टूटकर बिखर जाओगे

जाओ बनाओ कोई और आशियाँ अपना, मग़र क्या बना पाओगे?


" कुछ ख़त तेरे नाम के "

ख़त तेरे नाम के आज भी दबे हैं, डायरी में मेरी

जिन्हें तुमने कभी खोला भी नहीं, अमानत हैं तेरी


मैंने हिफ़ाज़त से रखे हैं संभाल कर निशानी तेरी

तेरी नफ़रत मेरी मोहब्बत की, कहानी है तेरी मेरी


बैठे हैं चुपचाप पुराने पन्नों में दबे, डरे सहमे से

जाने कब पड़ जाए बिछड़ना मुझसे, कुछ ना कहते


तुम ना सही, कम से कम ये तो वफ़ादार हैं मेरे

तुम ना लगे मग़र ये रहते लगे अक्सर सीने से मेरे


ना कोई ग़म, ना करते कभी कोई शिकायत मुझसे

बस एक बेनाम सा रिश्ता कोई निभाते आये हैं मुझसे


" ज़िंदगी के सफ़र में "

ज़िंदगी के सफ़र में बेशक़ हमारे रास्ते अलग हैं

तन्हा खड़े हैं, आज तुम अलग और मैं अलग हैं


ये राहें ज़िंदगी की छोटी पथरीली और संकरी हैं

कैसे कटेंगे ये रास्ते, जब हम तुम अलग चले हैं


अपने से ना अब तुम हो अपने से ना अब हम हैं

कैसी आज़माइश है, तुझसे ना जुड़े से अब हम हैं


मोहब्बत के वो मोड़ चौराहें बहुत पीछे छूटे सब हैं

तेरी गलियों के वो चौराहे अब भी सुनसान चुप हैं


पूछते हैं कि कहाँ गए वो लम्हें,आँखों में ना कोई गम हैं

बड़ी आरज़ू थी, तेरा हाथ संग हो, अब तो सिर्फ़ गम हैं


काश वो पल मोहब्बत वाले फ़िर से लौट आते कहीं से 

तुम भी मुस्कुराते आँखों में प्यार लिए लौट आते कहीं से


" छली हुई स्त्री "

स्त्री जो छली गयी

कभी अपने प्रेमी से

कभी अपने पति से

कभी घर के अपनों से

कभी सारे समाज से, 

बच ना सकी वह कहीं भी

और कभी वह छली गयी

कभी ख़ुद के डर से, 

ख़ुद से भी ख़ुद को

बचा ना सकी, 

कैसी विडंबना रही

जो थी मज़बूत स्तंभ

आज सहारे ढूँढती

तलाशती घूम रही

" तन्हा खड़े हैं "

ज़िंदगी के सफ़र में बेशक़ हमारे रास्ते अलग हैं

तन्हा खड़े हैं, आज तुम अलग और मैं अलग हैं


ये राहें ज़िंदगी की छोटी पथरीली और संकरी हैं

कैसे कटेंगे ये रास्ते, जब हम तुम अलग चले हैं


अपने से ना अब तुम हो अपने से ना अब हम हैं

कैसी आज़माइश है, तुझसे ना जुड़े से अब हम हैं


मोहब्बत के वो मोड़ चौराहें बहुत पीछे छूटे सब हैं

तेरी गलियों के वो चौराहे अब भी सुनसान चुप हैं


पूछते हैं कि कहाँ गए वो लम्हें,आँखों में ना कोई गम हैं

बड़ी आरज़ू थी, तेरा हाथ संग हो, अब तो सिर्फ़ गम हैं


काश वो पल मोहब्बत वाले फ़िर से लौट आते कहीं से 

तुम भी मुस्कुराते आँखों में प्यार लिए लौट आते कहीं से


" मर्द भी रोया करते हैं "

कह नहीं पाते जब किसी से, 

ख़ुद को शब्दों में पिरोया करते हैं, 

सामने किसी को आँसू दिखाते नहीं

मर्द भी अकेले में रोया करते हैं, 

दर्द जब बढ़ कर आ जाए गले तक

ना निगलते ना सटकते हैं कहीं गले से,

कहते नहीं किसी से कभी दिल की

ख़ामोशी से ही बयाँ करते हैं, 

ज़ख़्म बड़ा हो तो उतर आता है आँखों में

दिखाते नहीं कभी किसी को, 

नज़र बचा कर सबसे छिपाया करते हैं

बना लेते छोटी कब्रगाह सीने में

बस वहीं दफ़नाया करते हैं, 

झूठ नहीं सच है ये, गर मानो तो

मर्द भी गहरे ज़ख़्म पा कर रोया करते हैं!


" मोहब्बत मेरी "

मोहब्बत मेरी उड़ गयी शाख से टूटे हुए सूखे पत्तों की तरह

मैं उन्हें हवा के झोंकों से इधर उधर उड़ता हुआ देखती रही


उड़ गयी मोहब्बत मेरी सूखे पत्तों की तरह लावारिस सी

और मैं चाह कर रोक पकड़ भी ना सकी, खड़ी देखती रही


देखती रही इधर से उधर, उधर से इधर जाते उड़ते हुए मग़र

चाहती तो रोकती कैसे, उन्हें भी तो ऊँचा उड़ने का शौक था


" दो झटकों में ज़िंदगी का सफ़र "

जब माँ गई तो लगा कि सारी हँसी ख़ुशी चली गई,

अब तक कभी दिल से ख़ुश नहीं हो सकी,

मुस्कुराती ज़रूर हूँ मग़र दिल से नहीं

और जब पापा गए तो लगा सारे हक़ खत्म

एक झटके में खुशियाँ खत्म, दूसरे में सहारा खत्म

क्या बताएँ तुझे ए ज़िंदगी कि दो झटकों में ज़िंदगी खत्म

कैसे कहुँ कि दो झटकों में सारा खेल खत्म

ज़िंदगी ने संभलने का मौका भी ना दिया

जी रहे हैं लेकिन सच कहें तो काट रहे हैं ज़िंदगी तुझे

ज़िंदगी जी तो माता पिता के साथ जाती है,

बाकी ज़िंदगी तो हम काटते हैं, 

कभी इसके लिए कभी उसके लिए।

ज़िंदगी तू बहुत बेरहम है,

क्या तुझे ज़रा भी तरस ना आया मुझपे

बहुत मुश्किल है अपनों के बिना जीने का दर्द बयाँ करना


" मैं ही मिलूँगी "

तू चल ले कहीं तक भी बेवफ़ा सनम

लौट कर तो मेरे पास ही आना है तुझे


बहती लहरों संग जो तू हो चला है

मचलती धाराएँ तेरी मंज़िल नहीं है


आना तो है तुझे इस पार, इसी किनारे पर

तू खूब भटक ज़िंदगी की सुनसान राह पर


जब तेरा दिल भाग भाग कर थक जाए और

दुनिया की झूठी रस्मों से तेरा दिल भर जाए


तब तुझे ए सनम उस मुश्क़िल भँवर में उम्मीद लिए

नैया पार लगाने के लिए मैं ही मिलूँगी, अपनी बाहें फैलाये


" तू बस मेरा हो जाए "

प्रेम में राधा हो जाऊँ

प्रेम में मीरा हो जाऊँ, 

रुक्मिणी तो बन गयी

कभी प्रेयसी ना बन सकी, 

हृदय यही चाहे कि बस

तेरी प्रेयसी बन जाऊँ

तू बस मेरा हो जाए


" वफ़ा करते करते सनम "

वफ़ा करते करते सनम हम रुसवा सरेआम हो गए

मेरे इश्क़ और तेरी बेरूखी के किस्से तमाम हो गए

इश्क़ नहीं ना सही, झूठा ही सही, मेरा दिल तो रख लेती

चाहत में लिखे, जो ख़त उन्हें एक बार होंठों से चूम ही लेती

ज़िंदगी भर का नहीं दे सकती ना सही, चार कदम संग चल लेती


" थोड़ी सी बेवफ़ाई "

तकिया के गिलाफ़ आँसुओं से गीले मिलते रहेंगे

वफ़ा तुझसे की, वफ़ा करते हैं और करते रहेंगे


बेशक़ बेवफ़ाई तेरा हक़ था, तूने इस्तेमाल किया

मेरे इश्क़ का तू राजा है, जा मैंने तुझे माफ़ किया


लाख कोशिशों की मुश्किलों के बावज़ूद तुझे पाया था

मग़र तूने आदतन बेवफ़ाई का रास्ता इख़्तियार किया था


क्या मिला तुझे ए तंगदिल बेवफ़ा हमसफर बेवफ़ाई करके

किसी को तू यूँ ही मिल गया मुझसे थोड़ी सी बेवफ़ाई करके


ए सनम कह देता एक बार यूँ ही फ़ना हो जाते तुझ पर

बोलता तो सही प्यार से, तेरे रास्ते से हट जाते मुस्कुरा कर


बहुत घाटे का सौदा किया तूने ए इश्क़ के सस्ते व्यापारी

अब तो दिखाई, आगे कभी ना आज़माना तू अपनी ये होशियारी


मुझ जैसा वफ़ादार जीवनसाथी तुझे कभी नहीं मिलेगा

वक़्त बीतने दे फ़िर देखना, तू मुझे देखने को भी तरसेगा


" वो रिश्ते "

वो रिश्ते जो बेहद अज़ीज़ थे बेहद करीब थे मेरे

समय के चलते सब छोड़ कर चले गए हाथ मेरे


अब इन ख़ाली हाथों को देख कर सोचती हूँ कि

कितने गरीब और बेचारे रह गए नायाब रिश्ते मेरे


" दिल का दर्द "

बहुत बार सोचती हूँ कि

अपने दिल को ख़ाली कर दूँ

इस दर्द को बाहर निकाल कर उड़ेल कर कहीं छिपा दूँ

मग़र इसका भी कम्बख्त मेरे सिवा कोई वफ़ादार नहीं


" तू छोड़ दे "

ख़ुद को तकलीफ में देखकर अक्सर दिल को तकलीफ़ हुई

नागवार गुज़री वो सभी बातें जो भी मेरे साथ बीती और हुई


क्या कहते, क्या कह कर समझाते इस नादान दिल को

कि बाग़ तो उजड़ना ही था जब ख़ुद माली ही बीमार था


ए दिल जानती हूँ कि इन दिनों तू मुझसे नाख़ुश है मग़र

इसका इलाज़ यही है कि अब तू छोड़ दे मुझे मेरे हाल पर


" उलझे धागे "

ए ज़िंदगी तुझे खूब समझने की कोशिश की

उलझे धागों को बहुत सुलझाने की कोशिश भी की


मग़र तेरा कण भर भी सुलझा ना सकी

क्योंकि कैसे सुलझाती, जब इसमें रज़ा उसकी थी


" ज़िंदगी के हाथों "

जब मैं पानी में डूब रही थी तो बहुत कोशिश करती थी, 

ख़ुद को बचाने की, लाख कोशिश करती थी, हाथ पैर मारती थी,


मग़र वक़्त के तूफ़ान और थपेडों से बच नहीं सकी थी, 

अब ख़ुद को लहरों के हवाले छोड़ दिया है, वो जहाँ ले जाएँ


शायद कुछ अच्छा हो, क्या पता ऐसे ही किनारा मिले

अब तो ज़िंदगी के हाथों खिलौना सी लगती हूँ वो जहाँ ले जाए


" एक मुलाक़ात का मौका "

हो सके तो एक मुलाक़ात का मौका देना

बेशक़ बगल से बिन बोले ही निकल जाना


जाने के बाद लौट कर फ़िर कौन आता है

जाने वाले को दूसरा यार मिल जाता है


गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

" जान को मुश्क़िलें "

मेरी मोहब्बत और मेरी चाहत से रिहाई तुम्हें कभी नहीं मिलेगी

राह ए मोहब्बत से तू मेहरूम ही है, तुझे नेमत कभी नहीं मिलेगी

तुमने अपनी जान को मुश्क़िलें ख़ुद बढ़ायी हैं, ये कम नहीं होंगी

हमारे बीच मीलों की दूरियाँ हैं, मग़र राहें कभी खत्म नहीं होंगी

खुशकिस्मत हो तुम, जो मेरे इश्क़ की बारिश से सरोबार बैठे हो

संग बदकिस्मत भी हो, जो ख़ुद को मुझसे अलग किये बैठे हो


" मोहब्बत की कश्मकश "

कुछ बिखरे और फटे पन्नों को समेट कर सोच रही हूँ

इन्हें क्यों लिखा था तुमने, जब इनमें मैं कहीं भी नहीं हूँ


यही हैं वो जिन्हें मुझे देते हुए तुमने अपनी मोहब्बत का इज़हार किया था

ना चाहते भी तुमने अपनी झूठी मोहब्बत में जकड़ कर क़ैद कर लिया था


बेशक़ तुम इश्क़ की रवायतों से, मुझसे दूर हो, तुम में मैं कहीं नहीं हूँ

मग़र मैं इश्क़ की अज़ब कश्मकश में हूँ, ना मैं क़ैद में हूँ, ना मैं रिहा हूँ


" फ़ैसला कर लिया "

मुझे बेइंतेहा मोहब्बत थी उससे, मग़र शायद उसे ना थी

पीछा छुड़ाने के, फ़ासले बनाने के लाख बहाने ढूंढ रहा था


मैंने अपना हाथ छुड़ा कर, उससे दूरी बना कर फ़ैसला कर लिया

ख़ुद ही उसकी मुश्क़िलों को आसान कर दिया, आज़ाद कर दिया


" गुलाबों सी कोमलता "

गुलाबों सी कोमलता सिर्फ़ मोहब्बत में ही हो सकती है

प्यार से रखो तो सुर्ख नर्म और मुलायम एहसास देता है


कदमों तले रौंद दोगे तो हाथ नहीं कुछ पाओगे

ग़ुलाब संग काटों से भी बेइंतिहा ज़ख़्म पाओगे


" इम्तिहान ए इश्क़ "

क़दम क़दम पर इम्तिहान ए इश्क़

क़दम क़दम पर दूरियों के अश्क़

ये मिलने नहीं देंगे, लगता है कुछ

मग़र इतना तो यकीं है मुझे कि

चाहतों का ये सफ़र दूर तलक चलेगा


" तेरी यादों के फूल "

तेरी यादों के फूल अब किताबों में पाए जाते हैं

कभी नर्म हुआ करते थे, अब सूख कर झड़ जाते हैं


कभी हाथों की शान होती थी, बालों में महकती थी

अब तुम्हारी निशानियाँ किताबों में ही महकती हैं


" दुख बहुत हैं "

दुख बहुत हैं तुझसे बिछड़ने के मग़र

बेइंतेहा दर्द पहले से कम हो गया है मेरा


मैं ख़ुश हूँ लेकिन बहुत तकलीफ़ है सीने में 

हूक सी उठती है कभी कभी बेसबब बेइंतेहा


तुझसे मिलने की प्यास फ़िर जाग खड़ी होती है

कदम उठते हैं बहुत बार, मगर उन्हें मैं थाम लेती हूँ


बहुत ज़ददोज़ेहद के बाद ही दिल को मना पाती हूँ

मानती हूँ कि दुख बहुत है लेकिन दर्द पहले से बेहतर है


" एहसास गणित के सूत्र "

ज़िंदगी रोज़ नया इम्तिहान ज़रूर है मग़र

इसमें लगते एहसास गणित के सूत्र नहीं कि


कोई परेशानी आई, गणित का सूत्र लगाया

और समस्या का निदान हुआ और खत्म हुई,


ज़िंदगी में ग़र एहसासों को एहसास मिले तो

सोने पे सुहागा, समझो कोई लॉटरी निकल गई


उठते बैठते एहसासों को कोई हो जो समझे

हर इंसां किसी ऐसे ही हमसफ़र की तलाश में है


काश गणित जैसी ही होती ज़िंदगी 

लगती कठिन मग़र होती आसान


" गिले बाकी हैं "

ऐसी किस्मत कहाँ थी कि कभी

किसी का इश्क़ बेइंतेहा नसीब होता


किस्मत में तो दूसरों से बची हुई

चंद ही मेहरबानियाँ लिखी थी


और अब तो वो भी नहीं मिलती

किस्मत भी हार मान गयी शायद


क्यों मिलाया किस्मत ने जो तुम

किस्मत में थे मग़र नसीब में कहीं नहीं


क्या रह लेते हो तुम मुझ बिन

या अब भी कुछ गिले बाकी हैं मुझसे


" हम तुम "

आधे तुम आधी मैं, मिल कर बने थे हम

जब से तुम अलग हुए, रह गयी सिर्फ़ मैं


मग़र चल रही हूँ ऐसे, जैसे चल रहे हम

जाने कितनी हसरतें बसी थी इक हम में


रह गयी कुछ टूटी अधूरी बिखरी सी मैं

छूट गए सारे सपने, जब नींद से जागी मैं


भले ना आओ तुम कभी मेरे पास वापस

याद तो ज़रूर आती हूँ मैं, है मुझे विश्वास


ख़ाली हाथों को देख कर सवाल आता है

भला कभी ऐसे भी कोई रूठ कर जाता है?


" तुम्हारी याद "

तुम्हें भूलती ही कहाँ हूँ जो कहूँ कि

जब तुम याद आते हो

तो कैसा लगता है

मेरी सुबह होती हैं तुम्हारे साथ

शामें गुज़रती हैं तुम्हारी यादों के साथ

तुम मुझे तन्हा छोड़ते ही कब हो

जो आये मुझे हर पल तुम्हारी याद


" ये रात बावरी "

ये रात बावरी, अब हो चली अपनी

तुम कुछ सुनाओ कुछ कहो अपनी


मैं तो तुझे जानती हूँ, तेरी हूँ अपनी

कुछ सुनाओ तुम, जो लगे मुझे अपनी


रात हुई जवान, चाँद भी है जोश पर

मेरे प्रिय, देख लूँ तुम्हें एक नज़र भर


फ़िर मिलने आओ तुम, कभी हमसे

सबसे नज़र बचा कर अपनी छत पर


" कुछ ख़्वाब मेरे "

रेत की ज़मीन पर, बह चले हैं कुछ ख़्वाब मेरे

हाथों से फ़िसल रहे कुछ टूटे अधूरे ख़्वाब मेरे


मुठ्ठी बंद करने पर भी फ़िसल रहे हैं ख़्वाब मेरे

मुठ्ठी भींचने पर भी नहीं रोक पाती हूँ ख़्वाब मेरे


चलो बता देती हूँ, तुम्हें माँग रही हूँ ख्वाबों में मेरे

तुम चाहो तो पूरे कर दो, ये कुछ अधूरे ख़्वाब मेरे


जानती हूँ तुमसे अब ऐसा हो ना सकेगा, सनम मेरे

ज़्यादा नहीं, बस कुछ ऐसे ही नन्हें से हैं ख़्वाब मेरे


" सोचो अगर ऐसा हुआ जो कभी "

सोचा है, जो हम ना मिल सके घर, गाँव गलियारे में भी

ना मिल सके अगर हम कभी ख्यालों में या ख्वाबों में भी


कैसा होगा ऐसा जीवन सोचा नहीं, ऐसा लगता तुम्हें भी

क्या तुम बिता सकोगे कभी मुझ बिन एक पल ऐसा भी


शायद तुम रह लोगे, मग़र मैं नहीं रह सकती तुम बिन कभी

साँसों बिना तन क्या, तुम बिन जीवन क्या, ऐसा नहीं कभी


कोई जतन, लाख कोशिशें कर लो ऐसा कभी होगा नहीं

तुम ख़ुश रहो हमेशा, साथ मेरे रहो ऐसा ज़रूरी तो नहीं


" शाम होते ही "

शाम होते ही तेरी यादों के कारवां संग हो लेती हूँ

कुछ और नहीं तो तेरी तस्वीर से बातें कर लेती हूँ


जब सब सोते हैं, तू जागे मन क्यों नहीं सो पाती हूँ

ख़ुद के संग हो लेती, कभी यादों को तेरी धकेलती हूँ


इंतज़ार करती हूँ तो कभी राह तेरी देखने लगती हूँ

तेरे इंतज़ार की घड़ियाँ बहुत लंबी हैं, महसूस करती हूँ


रात भर तेरी यादों का दिया जलता है, सोती नहीं हूँ

मन तो तेरे पास ही रहता है, कभी बुलाती नहीं हूँ


बेचैन करता है ये मन क्यों जागे, बहुत पूछती हूँ

सुलझ नहीं पाती ये पहेली मुझसे, उलझी रहती हूँ


" भरोसा "

सस्ते लोगों पर भरोसा करना बहुत महंगा पड़ रहा है

हर बार सिर्फ़ ऐसे ही लोगों से क्यों पाला पड़ रहा है


धोखेबाज़ों की कमी नहीं, मिल जायेंगे बीच बाज़ार

हर तरफ़ घूम रहें खूब, होगा बचना हमें इनसे हर बार


कोई जल्दबाज़ी ना करना, अपना विश्वास जमाने में

धोखेबाज़ी के सिवाय कोई दूसरा ग़म नहीं ज़माने में


दिल को थाम लेना अपने कस, यूँ ही ना दे देना इसे

हाथ पकड़ना सिर्फ़ उसी का, जो समझे दिल ओ तुम्हें


ये दुनिया है हर पल रंग बदलती है, सीख रहे हम भी

बहुत दिल टूटा हमारा, अब तुम बच कर रहना सभी


" अजीब सी मोहब्बत "

अजीब सी है तेरी भी मोहब्बत,

ना खत्म ही हुई, ना कभी नसीब हुई


ऐसा इश्क़ भी किस काम का, 

ना तेरे काम का, ना मेरे काम का


शादी के न्योते छप ना सके

इश्क़ के इश्तहार तमाम हुए


सनम की गलियों में आवारा तमाम हुए

तुम्हें भी पा ना सके, बदनाम सरेआम हुए


दिल ना लगाना कभी किसी से तू साक़ी, बहुत पछताएगा

निकाल ना सकेगा कभी दिल से उसे, सिर्फ़ याद कर पायेगा


" क्या चाहती है ज़िंदगी "

ए ज़िंदगी, क्या ज़िंदगी भर यूँ ही चलना होगा

क्या फ़िर कभी उनसे दोबारा मिलना ना होगा


सुना है उम्मीद पर दुनिया क़ायम है, रहनी भी चाहिए

मुझे और कुछ नहीं चाहत, बस तेरी एक झलक चाहिए


काश किसी मोड़ पर तुमसे, हम यूँ ही टकरा जाएँ

तेरे बगल से गुज़रने से ही मेरी, प्यासी रूह भर जाए


क्यूँ लगे ऐसा कि तेरा मिलना, यूँ इत्तेफ़ाक़ तो ना था

जाने क्या साज़िश रही ख़ुदा की, जो बिछड़ना लिखा था


इल्म है मुझे कि कसूर तो हमने बहुत किये थे अपनी ज़िंदगी में

मग़र ये भी सच है कि सज़ा हमें वहाँ मिली जहाँ हम बेक़सूर थे


" कैसा ये इश्क़ है "

आदत नहीं बस तुम मेरी ज़रूरत हो

ऐसा बोल कर दरवाज़ा बंद करवा देते हो


बिन देखे बिन बात करे रह नहीं सकते हो

और मुझे मोहब्बत ना करने का मश्विरा देते हो


इश्क़ और ज़रूरत में बहुत थोड़ा ही अंतर है

तुम्हें मुझसे मोहब्बत है मुझे इश्क़ की मनाही है


ज़वाब मांगते हो मुझसे कि क्या मुझे तुमसे इश्क़ है

और कहते भी हो कि मुझे तुमसे इश्क़ नहीं करना है


ये कैसी अजब दुविधा है, तुम्हें अपना नहीं कह सकती

तुम अपना नहीं सकते और मुझे किसी और का होना नहीं है


" चिठ्ठी तेरे नाम की "

एक चिठ्ठी तेरे नाम की, प्यार भरे पैग़ाम की

नज़र करती हूँ तुझे, आवाज़ सुनो धड़कन की


करती हूँ इल्तिज़ा तुमसे, आओ अब थाम लो मुझे

बहती हूँ तेरे इश्क़ में, पनाह दो अपनी बाहों में मुझे


" क्या लिख दूँ "

इस कोरे काग़ज़ पर क्या लिख दूँ

प्यार लिख दूँ या बेरुखियां लिख दूँ

दीदार लिख दूँ या इंतज़ार लिख दूँ

इश्क़ लिख दूँ या नफ़रतें लिख दूँ

धोखा लिख दूँ या ऐतमाद लिख दूँ

तू ही बता, दिल ए जान लिख दूँ या

तुझे मेरी रूह का क़ातिल लिख दूँ

अब तू ही बता मैं तुझे क्या लिख दूँ

वफ़ादार हमसफ़र लिख दूँ या तुझे

खुली आँखों से देखा धोखा लिख दूँ


" हमसफ़र कहाँ मिलेगा "

मुझे जो चाहिए वो इंसां यहाँ कहाँ मिलेगा

मन चाहा साथी वो हमसफ़र कहाँ मिलेगा


साथ देता जो, बस ऐसा साथी चाहिए था

ज़िंदगी के ऐश ओ आराम की तलब किसे


प्यार भरी संग निभाने की कसमें, झूठी ही सही

कुछ कहता सुनाता, मेरी सुनना ज़रूरी नहीं था


उसका हर पल साथ रहना ज़रूरी नहीं था

आँखों से ही चूम लेता ऐसा साथी चाहिए था


मग़र ज़िंदगी के मरुस्थल को ख़ुद ही पार करना है

ऐसी जन्मों सी दूरी किस्मत है, बताना चाहिए था


" छल से भरा "

हर सागर जल से भरा है

हर इंसान दुनिया में 

छल से भरा है 

नहीं पहचान होती

इनकी किसी से, 

अजब कशिश और मिठास

होती इनकी बातों में,

पहचान ना सकोगे

आसानी से

दिल जीत लेते बहुत जल्दी

अपनी बेमानी से, 

ज़ज़्बातों से खेल

आसानी से चल देते, 

अपना सा मुँह लेकर हम

ठगे से बैठे देखते रह जाते!!


" काश! वक़्त रुक जाता "

बहुत प्यारे लम्हें थे वो,

काश! वक़्त रुक जाता, 

जिनमें हम तुम साथ थे, 

ना तुम्हें कोई शिकवा था

ना मुझे कोई शिकायत थी

मग़र जाने क्या हुआ अचानक

तुम बिन बात ही रूठ गए

लाख मना लूँ, जानती हूँ

वापस आने के लिए नहीं गए हो!!!


" ज़िंदगी की कश्ती में "

हर इंसान सवार है ज़िंदगी की कश्ती में

मग़र मंज़िल सबकी अलग अलग है

ना मालूम है किसी को भी अंत तक

कि किसका सफ़र कहाँ तक है और

ना किसी को अपनी मंज़िल की ख़बर है

बेशक़ ज़िंदगी की कश्ती में सब सवार हैं

सब अंजान मंज़िल की तरफ़ सफ़र में हैं


" कैसे भुलाऊँ तुझे "

मेरे रोम रोम में बसती हो, कैसे भुलाऊँ तुझे

मोहब्बत की सरहदों को पार कर तुझे पाया

हमेशा मेरे दिल की गहराईयोँ में रहती है तू

कैसे दिल की गहराई से तुझे निकाल भुला दूँ

समझ लो ग़र समझ सकती हो मुझे तुम

जीवन भर रह नहीं सकता तुम्हारे बिना मैं

कैसे भुलाऊँ तुम्हें, कोई सूरत नहीं दिखती

इश्क़ है और हमेशा रहेगा तुमसे मुझे

चाहे जो हो जाए, भुला नहीं सकता कभी तुझे

कभी तन को आत्मा से अलग जिंदा देखा है? 

फ़िर कैसे मैं तुम्हें भुला कर ज़िंदा रहूँ?


सोमवार, 6 दिसंबर 2021




 


 

" आख़िरी बार माफ़ कर दो "

तुम कहते हो कि "मुझे आख़िरी बार माफ़ कर दो"

मग़र कैसे माफ़ कर दूँ, सपनों के बेरहम हत्यारे को

मेरी रूह से माफ़ी की उम्मीद ना करो, बेहतर होगा

रूह छलनी है, जिस्म बिखरा हुआ, मरे हैं ज़ज़्बात

तू ही बता ऐ क़ातिल, तेरी ख़ता कैसे माफ़ कर दूँ 

ग़लती की माफ़ी होती है, गुनाहों की नहीं, फ़िर कैसे

खुदा भी माफ़ नहीं करता ऐसी ग़लती, फ़िर मैं कैसे

गुनाह जो तूने किये, माफ़ कभी नहीं किये जायेंगे

देखना तू भी वो मंज़र सज़ा का, वो भी होगा वहीं

तड़पन और बिखरन तू ख़ुद में तब महसूस करेगा

वो फ़ैसला उसका भी भयानक से भयानक रहेगा

बस तू तैयारी में रह अब, फरमान तेरे नाम का है

उसके दरबार में पेशी तेरी कहीं किसी रोज़ अब होगी

कोई फ़रियाद चीख़ पुकार अब काम ना तेरे आयेगी

सोच ले, बख़्शा हरगिज़ ना अब तू कभी जायेगा

ए आदम, जान ले तेरी ज़ात ने बहुत धोख़ा दिया

समेट ले अब सब, तेरी डोली निकाली जायेगी

कोई विदाई गीत ना अब कोई तेरी सखी गायेगी,

बिन मुहूर्त के तेरी डोली अब निकाली जायेगी

माफ़ी मुझसे नहीं उससे मांग, रज़ा उसकी मानी जायेगी


" मिलन की प्यास "

तड़प बेहिसाब, तन्हाई बेहिसाब

मिलन की प्यास भी है बेहिसाब

क्या करे बेचैन दिल है मेरा यूँ

तड़प मिटती नहीं तेरी यादों से

किसी शाम सोचूँ तुझे और तू आ जाए

आँखें बंद करूँ तो दीदार तेरा हो जाए


" पीछे छूटी चीज़ें "

पीछे छूटी हुई तमाम चीज़ें

अनमनी दोपहरियां

अंधेरे के दीप्त क्षण

फिर याद आने लगे हैं

वे लयात्मक हंसी की बातें

कपसीली सांझ के उतरते अर्थ

अब भी थर-थराती तीन पहर झील में

दूरी के विष का इतिहास रच रहे हैं

अरण्यक दृष्टि संपन्ना

तपस्विनी का धैर्य सराहनीय है

जिसने विगत महाभारत में

किसी को अभिशाप नहीं दिया

उन तमाम कसैले अनुभवों को

अपने अंतर में समेट काग़ज़ पर उतार

होंठों से हँस दिया


" काफी नहीं है "

क्यों नहीं जी पाती हूँ

तमाम खुशियाँ छिपाये

हर उन क्षणिक पलों को

जो यूँ ही गुज़र जाते हैं ज़िंदगी में

कभी बन जाते कल्पना

कभी हो जाते सपने

मग़र फ़िर भी रहते हैं

सिर्फ़ मेरे और मेरे अपने

क्या यही एहसास काफी नहीं है

खुश होने के लिए? 

सब कुछ खोने के बाद

जिंदा हूँ मैं इतना काफी नहीं है


" वर्जित फल "

वर्जित फल चखना

कितना मीठा लगता है

जबकि नहीं जानते कि

उसके असीम फीकेपन की

एक भी फांक

गले से उतरनी

उतनी ही कठिन होगी

जितनी की

वर्जित फल को चखने से

ख़ुद को रोकना!!


" यथार्थ "

अनेक बार

यथार्थ की आँखों से

मंज़िल को बहुत पास से देख

मन मचल उठता है, 


पास जाने पर, जाने क्यों

दूर छिटक जाती है वह

ठीक उसी तरह जैसे

पत्ते पर रखी ओस का फिसलना

चाहकर भी ना पकड़ पाने की

नाउम्मीद हृदय को झकझोरती है, 


और शायद कहना चाहती है

कोशिशें अभी और बाकी हैं

अंजाम वक़्त के पिंजरे में

भविष्य की तरह आज भी क़ैद है !


" दिल अक्सर रोया "

मैंने तो यह देखा है

कि मैं जब भी मुस्कुरायी हूँ

मेरा दिल अक्सर रोया है

दुनिया के जागरण में, 

सारी उम्र बैठ कर भी

चुपचाप अकेला सोया है

नहीं जानती

सुप्त अवस्था का सच, 

सच है या जागने का सच, 

इतना कुछ काटने के बाद भी

बहुत कुछ बोया है!!


"ख़ामोशी "

आज फ़िर एक बार उसी ख़ामोशी ने

उसी ख़ामोशी से मेरा दामन पकड़ा

शायद शब्दों की कमी पड़ गयी

तुम्हें समझाने को, 

तुम चुप रहकर भी

कुछ कह गए उस ख़ामोशी में

एक पल के लिए ख़ामोश हो गयी

मेरी ज़िंदगी उसी ख़ामोशी में!


" रिश्ता "

एक रिश्ता जो अभी बन रहा था

टूटने लगा बनने से पहले

एक सहारे से उठते थे हम

गिर गए मग़र संभलने से पहले! 

जलाने लगे जो उम्मीदों के चिराग़

बुझा दिए गए जलने से पहले! 

सीखने लगे थे आप से मुस्कुराना, 

रुला दिया हमें हँसने से पहले! 

भिक्षा के लिए जो हमने झोली फैलायी, 

खींच लिया हाथ कुछ देने से पहले! 

परिभाषा जीवन की खोजने जो निकले,

ज़िंदगी छिन गयी जीने से पहले! 

एक महल बनाया सपनों की दुनिया में, 

गिर गया नींव रखने से पहले! 

क्या यही अर्थ होता है रिश्तों का, 

टूटना होता है इन्हें बनने से पहले!


" प्रतीक्षारत हूँ "

सरिताओं का सागर

गहरा उमड़ा था

जब देखा था तुमने

स्नेहिल आँखों से

चाहती थी डूब जाऊँ उनमें

परंतु नहीं पा सकी

तुम्हारा वह अस्तित्व

फ़िर प्रतीक्षारत हूँ

इसलिए आज तक

शायद मिलोगे कभी तो

स्वप्न में या ख्यालों में

एक अस्पष्ट-सी

परछाईं बनकर!


" लगाव है "

मैं उदासीन हूँ

हर उस चीज़ के प्रति

जो सिर्फ़ देती है दिखाई

जिसमें नहीं होती

भावनाओं को

कुरेदने वाली गहराई

मेरा लगाव है 

हर उस चीज़ से

जो सिर्फ़ दिखती ही नहीं

महसूस भी होती है

दिल के किसी कोने में

यदि तुम भी वही हो

जो महसूस किये जाते हो

तो बेशक़

तुमसे मेरा लगाव है!


"आँसू "

आँसू एक प्राकृतिक मरहम है

दिल में लगी चोट के लिए

उससेे उत्पन्न दर्द के लिए

औरत के लिए, मर्द के लिए

बच्चों के लिए, वृद्ध के लिए

सुख के लिए, दुःख के लिए

पर के लिए, ख़ुद के लिए! 

जब यह तरल मरहम

आँखों से निकलकर

कपोल की पगडंडी से

वृहत " सीनाक्षेत्र " में

प्रवेश करता है

तब ठंडक पहुँचती है

दिल में राहत मिलती है

और फिर होता है बोझ हल्का

एक हद तक भूलते हैं

हम ग़म कल का!


" बाबूजी "

बचपन में जब छोटी थी और थोड़ी सी मोटी थी

कभी पिताजी कभी बाबूजी कह उन्हें पुकारा करती थी

मेरे छोटे गुदगुदे हाथों को अपने मजबूत हाथों में थाम

वो कभी सैर को और कभी बाज़ार ले जाया करते थे

अनगिनत चीज़ें दिलाया और खिलाया करते थे

उन दिनों हम कितने अमीर हुआ करते थे

पिता का साया माँ का प्यार ही असीम दौलत होती थी

उन दिनों इस बात की कहाँ समझ थी, साथ समझ आता था

अब समझ आया है जब वो पास नहीं हैं

पिता का साया क्या होता है माँ की ममता क्या होती है

हमारी तो दुनिया माँ से शुरु और पिता पर खतम होती है

इन दिनों की कभी कल्पना भी नहीं की थी लेकिन गुज़ार रहें हैं

उनके बिना ज़िंदा तो हैं बस जीवन काट रहें हैं

हो जाती कभी बहुत व्याकुल, तब सत्य अपनाया नहीं जाता है

बीत रहे दिनों की कभी कल्पना नहीं की थी लेकिन बिता रहें हैं

उनके बिना ज़िंदा तो हैं लेकिन बस दिन बीत रहें हैं

जाते ही उनके खत्म हुए सब रिश्ते नाते और मायने

छूटे टूटे सब रिश्ते थे झूठे, जो कहते कभी हम जान हैं उनकी

कोई याद नहीं, कोई बात नहीं, कोई पुकारता नहीं है अब

बस जीये जा रहें हैं चले जा रहें हैं, मंज़िल का पता नहीं पर

बेमन्ज़िल ही सफ़र पर चल पड़े हैं बेमकसद चल रहे हैं

किसे कहें अब बाबूजी और किसे माता कह पुकारें

कैसे काटें अब उनके बिन दिन, जब रहें ना कोई सहारे

पिता आसमान और माँ धरती है दोनों असीम अनंतर

थकते नहीं कभी हारते नहीं बस चलते जाते निरंतर

जितना नमन करूँ कम है, आज फिर मेरी आँखें नम हैं

उन्हें याद कैसे करूँ, भूलते ही कब हम हैं

अपने से ही कहाँ हैं, उनके से ही दिखते हम हैं


"अलविदा "

जाने को तो सब बिन मुहूर्त के ही मेरी ज़िंदगी से चले गए

ना कुछ कहा, ना कुछ सुना, ना कभी कुछ बताया


चुपचाप ही ज़िंदगी से हथेली पर रेत की तरह फिसल गए

मौत ने अलविदा कहने का मौका तक ना मुझे दिया


सच है ये कि जाने वाला लौट कर कभी नहीं आया है

लेकिन जब कोई बता कर जाता है कि अच्छा अब मैं जाता हूँ


तुम खुश रहना, तुम्हें अभी बहुत लंबा सफ़र तय करना है

तब कलेज़ा फट जाता है एक अश्रुधारा अनायास ही बह जाती है


जो बिन कुछ कहे चले गए, उन्हें भी ना रोक सकी थी

जो बोल कर जाने को अलविदा कह रहें हैं उन्हें कैसे रोकूँ


नाराज़ हो कर जाने वाले को भला कब कौन रोक सका है

सोचती हूँ इस दिल पर पत्थर ही रख लूँ अब शायद


जाने कितनों को बेवज़ह जाते हुए बस मुझे देखते रह जाना है

कलेज़ा फट कर रह जाता है, दुनिया बेगानी बेमानी हो जाती है


जाने वालों की यादें रह जाती हैं, यादें ही वक़्त बेवक़्त आती हैं

ऐसा लगता है कि आसमान फोड़ दूँ या धरती का सीना चीर दूँ


बस कुछ भी ऐसा करूँ जिससे गए हुए लोगों को वापस ला दूँ

अब कैसे मैं उन्हें पुकारूँ और कैसे अपना हाल समझाऊँ


" दिल आज मायूस है "

दिल आज मायूस है, वजह ना कुछ ख़ास रही

छोड़ कर जाने वालों की भीड़ चारों तरफ रही


वापस कभी कोई आया नहीं जाने क्या बात रही

लाख पुकारूँ, कोई आवाज़ नहीं आती, सोचती रही


सूनी देहरी, पुरानी चौखट, कब से सूनी ही रही

बस आने वालों की आने की बाट जोहती ही रही


ना कभी कोई आया, मैं भी द्वार पर बैठी ही रही

पथराई डबडबाई आँखें आस में बस खुली ही रही


" इतना कहे "

काश बस वो इतना कहे मुझसे

कि उसे भी मुझसे मोहब्बत है

जितनी मुझे उससे है बेइंतेहा

रहेगी हमेशा चाहे रहूँ मैं जहाँ

कहे कि वो रह नहीं सकता 

बिन मेरे उलझती हैं उसकी साँसें

हक़ है उसका मुझ पर इस्तेमाल करे

जताए कि वो मेरा और मैं उसकी हूँ

उसकी साँसों में महकती ताउम्र रहूंगी

उसे बेपनाह इश्क़ मैं यूँ ही करती रहूंगी


" तुम में रम जाऊँ "

आओ हो जलमग्न तुमसे लिपट जाऊँ मैं, 

रूह से रूह की तरह तुम में समां जाऊँ मैं

परी सी दिखती, तुम्हारा रसपान करूँ मैं,

सदियों से तुमसे मिलन की प्यास लिए मैं

तुमसे मिलकर अपनी प्यास बुझाऊँ मैं,

आओ आज करीब मेरे तुम में रम जाऊँ मैं


" मुझे भी दर्द होता है "

दर्द होता है मुझे भी, मग़र कोई समझता ही नहीं

हमेशा एक नया ज़ख़्म मिलता है सौग़ात में ही सही


कैसे संभाले, इतने हैं कि संभाले संभलते ही नहीं

ज़ख़्म बेहिसाब यूँ मिल जाते हैं जैसे बिन मांगी मुराद


सालों से चल रहा सिलसिला इनका रुकता ही नहीं

जाने कब थमेगा ये रिवाज़ कोई बतलाता भी नहीं


हैरान हूँ देख कर मैं, जाने क्या सभी को सूझती रही

चाहती हूँ दर्द का आभास उन्हें भी हो, मग़र होता नहीं


भूल जाती हूँ हर ज़ख़्म, समेट कर रखना चाहती नहीं

बताना चाहती हूँ कि दर्द मुझे होता है, कह पाती नहीं


" अधूरापन "

अधूरी ख्वाहिशें लेकर कौन जीना चाहता है

मग़र अधूरी ख्वाहिशें लेकर हर कोई जी रहा है


ये अधूरापन ना जीने देता है ना मरने देता है

कैसे बयाँ करें, दिल में एक हुजूम सा उठता है


अधूरी कसक से अक्सर दिल कराह उठता है

ना चैन कहीं ये पाता है, बस बेचैन ही रहता है


दिल दिमाग़ में अधूरेपन को हर कोई ढो रहा है

ना बता पा रहा है ना ख़ुशी से चल पा रहा है


" इंतज़ार का वक़्त "

ठहर जाता है वक़्त, जब मुलाक़ात का वक़्त नज़दीक आता है

लम्हें कटते नहीं, वक़्त गुज़रता नहीं, बस कहीं ठहर सा जाता है


दूरी सही नहीं जाती है, और तुम्हारा भी कोई पैग़ाम नहीं आता है

कैसे कहूँ तुमसे, और देर का फ़ासला मुझसे सहा नहीं जाता है


हमारे मिलन का हर लम्हा तो जाने कैसे निकल सा जाता है

रोके नहीं रुकता थामे नहीं थमता, बस फ़िसलता सा जाता है


काश कभी ऐसा भी हो, मुलाक़ात के लम्हें कस कर पकड़ लूँ

उन मोहब्बत के लम्हों को कभी खत्म और फिसलने ही ना दूँ


मेरे हिस्से इंतज़ार ही क्यों आया है, सब्र का बांध टूट जाता है

जब देरी लगती है तुम्हें आने में, इंतज़ार का वक़्त ठहर जाता है


" हाथ छुड़ा कहीं जाना नहीं "

रात गयी सो बात गयी, शब्दों से कैसे आपको समझाऊँ,

मन में पुरानी यादों और इंसानों को लेकर कोई मोह नहीं

आप समझते हैं मन में अब भी उन्हें लेकर कोई आस रही

मैं अपनी बात शब्दों से समझाने में हमेशा असफल ही रही

वो एक बीता हुआ कल है, वापस उस कल में मुझे जाना नहीं

मेरी बातें सुन कर कितने प्यार से आसानी से पूछ लिया कि

"मैं सब ठीक कर दूँ", इन चंद शब्दों में क्या क्या नहीं समेट लिया

प्यार, समर्पण, लगाव, स्नेह, त्याग, आस सब कुछ उड़ेल दिया

इस बात पर कितनी व्याकुल हो गयी थी मैं कैसे समझाऊँ

कि मेरी किस्मत ख़राब रही और उनकी नीयत ख़राब रही

वो इंसान ही नहीं हैं इस लायक कि कभी प्यार को समझ पाते

आगे जो हो उसके लिए तैयार हूँ, मुझे ग़लत कभी करना नहीं

बहुत सहन किया, वापस उस नरक में मुझे अब कभी जाना नहीं

जो करते रहे अगर वो सही था, जो मैं कर रही हूँ वो भी ग़लत नहीं

ख़ुदा का हर फै़सला मुझे मंजूर है, इंसानों की अब परवाह नहीं

मैं खुश हूँ बहुत खुश और मेरा साथ देना, हाथ छुड़ा कहीं जाना नहीं

" मेरा भी घर "

काश मेरा भी कोई घर होता

सुबह उठते ही घंटी की आवाज़ गूंजती

दिन दोपहर किलकारियां गूंजती 

शाम ढलते पंछी लौटते

रात ढले सर छिपाये सब साथ होते

बस यही एक छोटा सा सपना है

काश कभी ये पूरा हो पाता

रिश्ता जिससे जुड़ा 

काश कभी दिल भी मिल पाता

" सच से सामना "

चेहरे को देर तक दोनों हाथों के बीच में

रख कर बहुत सोचा, बहुत रोई। 

बस इतना समझ में आया कि इस जीवन का कोई अर्थ नहीं, निरर्थक है ये। 

किसी काम या किसी चीज के लायक नहीं हूँ

आज समझ लिया और आभास भी कर लिया

बहुत दुःख हुआ जब लाखों की भीड़ में

ख़ुद को बेवकूफ पाया

सच तो यही है, 

और हाँ सच से आज सामना कर लिया मैंने

" ज़ख़्मों को अब मत कुरेद "

कभी आँसू कभी ख़ुशी बेची, ना चाहते हुए भी खिलखिलाती रही

तन मन मारा गया, मेरा बचपन नोंचा गया कभी लूटा खसोटा गया

रही बहुत बार ना नुकर करती, कभी धकेलती कभी चेहरा नोंचती

मग़र बद किस्मती से कभी बख़्शी ना गई, तन हर बार बिखेरा गया

घाव तो समय के साथ भर गए मग़र आत्मा छलनी हुई कभी ना भरी

क्या ज़िंदगी भर कीमत चुकानी पड़ेगी इस किरदार और वज़ूद की

अंजाने में सज़ा ये कैसी मुकर्रर की ए ख़ुदा तुमने इस औरत ज़ात की

जाने कब तलक झेलेगी और चुकायेगी परेशानी इस तन के साथ की

अब बस भी कर इन ज़ख़्मों को देना, अब और इन्हें नासूर ना बना

हिम्मत अब जवाब दे गयी है, मत कुरेद इन्हें, अब भर भी जाने दे

चैन से जी नहीं सकती तो कोई बात नहीं, सुकून से मर तो जाने दे

" कोई तो होता "

कोई तो होता जो सिर्फ़ मुझे ही चाहता

कुछ और नहीं सिर्फ़ प्यार ही तो चाहिए

और कुछ ये मन कहाँ कुछ चाहता है

दिल का ये सूनापन उसकी मोहब्बत से ही भर जाता

जानती हूँ किसी का भी प्यार कभी नसीब नहीं होगा

ऐसे ही खालीपन लिए जीना होगा

" मन चाहा साथी "

मुझे जो चाहिए वो इंसां यहाँ कहाँ मिलेगा

मन चाहा साथी वो हमसफ़र कहाँ मिलेगा


साथ देता जो, बस ऐसा साथी चाहिए था

ज़िंदगी के ऐश ओ आराम की तलब किसे


प्यार भरी संग निभाने की झूठी कसमें ही सही

कुछ कहता सुनाता, मेरी सुनना ज़रूरी नहीं था


उसका हर पल साथ रहना ज़रूरी नहीं था

आँखों से ही चूम लेता ऐसा साथी चाहिए था


मग़र ज़िंदगी के मरुस्थल को ख़ुद ही पार करना है

ऐसी जन्मों सी दूरी किस्मत है, बताना चाहिए था

" छाँव "

तपती दुपहरी-सा यह जीवन और तुम शीतल-सी छाँव

उग रहे मन में फफोले हैं, अपने भी ग़ैर और अबोले हैं

कड़ी धूप बरसाती अंगारे, सपनों के झुलस गए पाँव

तपती दुपहरी-सा यह जीवन और तुम शीतल-सी छाँव


नेह हुआ खंड-खंड चूर-चूर, छूट गए सब अपने बहुत दूर

तैरती रही मन के सागर में, उन बिछड़ी यादों की नाव

सागर के तट हुए दुखियारे, सूने हुए खुशियों के गलियारे

क्या करना चाँद के शहर जाकर, भला अपना मिट्टी का गाँव

तपती दुपहरी-सा यह जीवन और तुम शीतल-सी छाँव

" थोड़ी सी बेवफ़ाई "

तकिया के गिलाफ़ आँसुओं से गीले मिलते रहेंगे

वफ़ा तुझसे की, वफ़ा करते हैं और करते रहेंगे


बेशक़ बेवफ़ाई तेरा हक़ था, तूने इस्तेमाल किया

मेरे इश्क़ का तू राजा है, जा मैंने तुझे माफ़ किया


लाख कोशिशों की मुश्किलों के बावज़ूद तुझे पाया था

मग़र तूने आदतन बेवफ़ाई का रास्ता इख़्तियार किया था


क्या मिला तुझे ए तंगदिल बेवफ़ा हमसफर बेवफ़ाई करके

किसी को तू यूँ ही मिल गया मुझसे थोड़ी सी बेवफ़ाई करके


ए सनम कह देता एक बार यूँ ही फ़ना हो जाते तुझ पर

बोलता तो सही प्यार से, तेरे रास्ते से हट जाते मुस्कुरा कर


बहुत घाटे का सौदा किया तूने ए इश्क़ के सस्ते व्यापारी

अब तो दिखाई, आगे कभी ना आज़माना तू अपनी ये होशियारी


मुझ जैसा वफ़ादार जीवनसाथी तुझे कभी नहीं मिलेगा

वक़्त बीतने दे फ़िर देखना, तू मुझे देखने को भी तरसेगा

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

कश्मकश बढ़ती गई

एक बार इश्क़ और साँसों की भिड़ंत हो गई

दोनों में जम कर बड़ा दिखने की ठन गई


इश्क़ और साँसों की कश्मकश बढ़ती गई

मग़र किसी को भी जीत हासिल ना हुई


इश्क़ ने कहा मेरे बिना होता जीना मुश्क़िल

इसलिए मैं हुआ साँसों से भी बहुत बड़ा


साँसें बोली, जो थी सुन रही बहुत देर से थी चुप

मेरे बिना तुम कुछ नहीं, मैं नहीं तो इंसां नहीं


साँसों बिना शरीर नहीं इंसां नहीं, अजीब दुविधा फँसी

और इश्क़ बिना इंसां का जीना मुश्क़िल, कैसी ये घड़ी


खूब कश्मकश बढ़ती रही, भिड़ंत भी जारी रही

ना कोई निष्कर्ष निकला, ये दुविधा यूँ ही बनी रही

बुधवार, 14 जुलाई 2021

अंधेरी तन्हा

अंधेरी तन्हा रातों में जब

आँखें तकिया भिगोती हैं

हाथ अनायास ही

माफ़ी के लिए उठ जाते हैं

और दिल गिड़गिड़ाता है

और कहता है कि माफ़ कर दो

जाने कितने दिल तोड़े

और पाँव तले रौंदे होंगे

जाने कितने दिल तोड़े

कितनी आत्मा दुखायी होंगी

जो आज ये सज़ा मुकरर्र 

की है उसने मेरे लिए!

प्यार की बात अधूरी

जब प्यार की बात अधूरी हो..

जब बीच में थोङी दूरी हो..

जब मिलना बहुत ज़रूरी हो…

पर मिलने में मजबूरी हो..

तुम दिल में याद जगा लेना..

कुछ प्यार के दीप जला लेना..

जब मुझ से मिलने आ न सको..

और याद से बाहर जा न सको…

आँसुओ का पर्बत

किसी के आँसुओ का पर्बत पिघला गयी होगी

कभी दिल के खंडहरों में जाकर बैठ गयी होगी

दूर बैठी देखती होगी अरमानों को सिराते हुए

सोचती होगी कितने टूटे और कितने जाते हुए

नाज़ुक रिश्ते हैं ये आज नहीं तो कल टूटेंगे

ज़िंदगी एक मेला है इसमें कितने कब छूटेंगे

कोई निभा ना पाया साथ दिलों का भी गया

कुछ वादे कुछ कसमें देकर थोड़ा ठहराव पाया

ठहराव कुछ पलों का था स्थिरता नहीं ला पाया

आत्मबल

कौन है वह जो हर कदम पर

कदम से कदम मिलाकर चलता है साथ

दुःख की हो रात, सुख की हो बात

हाथ बढ़ाकर हाथों को देता है हाथ

तन्हा, तन्हाई में करूँ जो ख़ुद से बात

चुपके से आकर बतियाने लगता है, हर रात

धड़कनों में धड़कता है, साँसों में थिरकता है

बनकर एहसास। 

लाता है खुशियों की सौगात

चुप रहता, आवाज़ नहीं देता

लाख रूठे नाराज़ नहीं होता

ना कोई कमी, ना कोई कसर

मनाने में छोड़ता है वह हमसफ़र

उलझनों में उलझकर, परेशानियों से ऊबकर

हारने चलूँ ज़िंदगी से अगर

आ खड़ा होता है वह कमर कसकर

हर समस्या का हल है जो

बाह्य नहीं, आंतरिक बल है वह

कुछ और नहीं आत्मबल हैं वह......

ये दुःख

दुःखी तो हम रोज़ होते हैं

लेकिन ये दुःख जब

ज़्यादा बढ़ जाता है तब

ज़ख्मों से खून की जगह

शब्द टपकने लगते हैं।

नज़्म का सार

मेरी हर नज़्म का सार तुझ से है

तू ही अध्याय और पर्याय तू ही है

कैसे झुठला दूँ तुझे तू ही बसा है

सँवार लूँ तुझे अलंकारों से कर लूँ

सुसज्जित और गुनगुना हर घड़ी लूँ

अगर परछाईंयाँ बोल सकती

अगर परछाईंयाँ बोल सकती तो

सबसे पहले आकर मेरी परछाईं

मुझसे कहती कि हिम्मत मत हार

चल तू दिन रात चल कार्य पथ पर

अडिग रह मंज़िल की ओर हो अग्रसर

मार्ग से तू कभी मत भटक

जो हो रहा वो ठीक, नहीं हो रहा और भी ठीक

व्यर्थ चिंता ना कर भ्रम ना कर

ख़ुदा और ख़ुद पर विश्वास कर

छोड़ा सबने तेरा संग मैं ना कभी छोड़ूंगी

रहूंगी हर पल हर समय लग के तेरे अंग

एक पल ना गँवा संताप ना कर

जो बीत गया सो बीत गया

आगे का सफ़र बेझिझक तू तय कर

ग़र कोई नहीं है तेरा अपना यहाँ

मैं हूँ तेरे साथ, तू जहाँ मैं वहाँ

कितने चले गए

इतने लोगों की भीड़ में जाने कितने चले गए

छोड़ कर गए सो गए दिल भी हमारा तोड़ गए

जाने वाला चला जाता है

लेकिन दूसरे लोगों के रास्ते बंद कर जाता है

जाते जाते विश्वास भी ले जाता हैं और

खत्म कर जाता हैं वो उम्मीदें जो कभी

हम ने उनसे लगाई थी और

अब दुख नहीं होता किसी के जाने का

हर जाने वाले को देख कर सुकून मिलता है कि

चलो अच्छा है चला गया,

एक दिन तो इसे भी जाना ही था

हर बार बस धोखा देने और दिल तोड़ने का

तरीका बदल जाता है

लेकिन हमें भी भगवान ने ऐसा बनाया है कि

ख़ुद ही ख़ुद के टुकड़े जोड़ कर

नये सिरे से नये रूप में दिल जोड़कर खड़े हो जाते हैं

कि आओ अभी हमने हिम्मत नहीं हारी है

और बताओ अब किसकी बारी है.

टूटे दिल की व्यथा

टूटे दिल का नाता है टूटे दिल और उसकी व्यथा से

दर्द टपकता है उसकी दिखती रिसती दरारों से

जो भर नहीं सकती किसी दवा-ओ-मरहम से

दर्द कोई बयाँ नहीं कर सकता कहे या कलम से

टूटे दिल की व्यथा समझेगा वही जो ख़ुद टूटा हो दिल से

कुछ कर दिखाना है

ना थक कर बैठना है

ना उदासी में डूबना है

हिम्मत नहीं हारना है

लाख तूफ़ां आयें बेशक़

जज़्बा है ऐसा कि बस

अब कुछ कर दिखाना है

आधी मैं आधे तुम

आधा चाँद मेरा आधा तुम्हारा

आधा इश्क़ मेरा आधा तुम्हारा

बगिया के आधे फूल मेरे आधे तुम्हारे

आधी खुशियाँ मेरी आधी तुम्हारी

आधे दुःख मेरे आधे तुम्हारे

आधी रचना मेरी आधी तुम्हारी

आधी कोशिश मेरी आधी तुम्हारी

आधी प्यास मेरी आधी तुम्हारी

आधी चाहत मेरी आधी तुम्हारी

आधी तड़प मेरी आधी तुम्हारी

आधी ज़िंदगी मेरी आधी तुम्हारी

देख लो तुम, बांटा है सब मैंने आधा आधा

जो मिले हम तभी होगा सब पूरा

नहीं तो रहेगा ज़िंदगी भर अधूरा

फ़िर आधी मैं और आधे तुम

सुख की प्रतीक्षा में

इतना दु:ख मिला हमें कि धैर्य खो गए

सुख की प्रतीक्षा में अधीर हो गए l


सहारा देने का वचन तो दिया कुछ लोगों ने

पर देकर वचन वे लौटे नहीं घर जो गए l


मन में तो जगी आशा कई बार पर

बुझ गए दीये सब आशाओं के

तो फिर से हम वही पर सो गए

सुख की प्रतीक्षा में .......l

चिंताएँ

जाने कहाँ से शुरूआत हुई इनकी

जाने कहाँ खतम होंगी

बचपन में ना सुना था नाम जिनका

जाने कब ये मेरे पास आती गयीं

एक एक करके अनंत हो गयी

और जिनका अंत ना हुआ

वो चिंताएँ हो गयीं l

उसी ख़ामोशी ने

आज फिर एक बार उसी ख़ामोशी ने

उसी ख़ामोशी से मेरा दामन पकड़ा

शायद शब्दों की कमी पड़ गयी

तुम्हें समझाने को

तुम चुप रहकर भी कुछ कह गए

उसी ख़ामोशी में

एक पल के लिए ख़ामोश हो गयी

भरी ज़िंदगी उस ख़ामोशी में l

तेरी यादों के दीये

तेरी यादों के दीये चाँद हाथों में लिए

सोचते रहे रात भर

बिना पलक झपकाए एक पल भर

बैठा हूँ तेरी राह ए गुज़र पर

तू आये शायद इधर

निग़ाहें ठहरी है उसी रास्ते पर

तुझे दिल नहीं चाँद चाहिए पर

तेरी नज़र टिकी है उस पर

चाँद की चाहत है तुझे

अजब तेरी चाहत है भंवर

तू दागदार चाँद की दीवानी है मग़र

तुझे पाक साफ़ दिल की नहीं कोई क़दर l

दिल के आईने

दिल के आईने को फूलों से सजा रखा है

दिल में तेरी ही सूरत मूरत को बिठा रखा है

तू माने या ना माने तेरे लिए ही अब तक बचा रखा है

तूने भी ना जाने क्या ठान रखा है किसके लिए

अपना दिल अभी तक अपने पास छिपा कर रखा है

कुछ डरी हुई सी आहें

कुछ डरी हुई सी आहें हैं

कुछ सहमी हुई सी चाहतें हैं

कैसे कहें कि तुमसे कितनी मोहब्बतें हैं

रिश्ता पलों का नहीं जन्मों का है तुमसे

रिश्ता अधूरा रहने की आहें हैं

रात भर नींद नहीं आती और जलती आहें हैं

डर है कहीं खो ना दूँ तुम्हें

सहमती हूँ कैसे रहूंगी तुम बिन

रात के काले गहरे अंधियारे में

जब सिसकती हैं ये आहें

आवाज़ नहीं करती लेकिन

ये कलेज़ा चीर देती हैं रात का

कैसे बताएँ तुम्हें कि कितने

खंज़र जिग़र के पार होते हैं

किस से कहें किस से नहीं यही उहापोह आहें हैं

रिश्ता जन्मों का नहीं तोड़ना है

कैसे कहूँ तुमसे कितनी चाहतें हैं

पूरी नहीं हुई जो चाहतें वही तो मेरी आहें हैं

मंगलवार, 6 जुलाई 2021

तन्हा रातों में

अंधेरी तन्हा रातों में जब

आँखें तकिया भिगोती हैं

हाथ अनायास ही

माफ़ी के लिए उठ जाते हैं

और दिल गिड़गिड़ाता है

और कहता है कि माफ़ कर दो

जाने कितने दिल तोड़े

और पाँव तले रौंदे होंगे

जाने कितने दिल तोड़े

कितनी आत्मा दुखायी होंगी

जो आज ये सज़ा मुकरर्र 

की है उसने मेरे लिए!

प्यार की धूप ढल गयी

वो रात सुहानी ढल गई
प्यार की धूप भी ढल गयी
बहुत गुमां था प्यार पर
ये भ्रम भी दूर कर गयी
कभी प्यार का सूरज
चढ़ा था परवान अब वो
प्यार की धूप भी ढल गयी
दूर हुई सब ग़लतफहमियाँ
रात आई लेकर अब दूरियाँ
फैला अंधियारा ढली रोशनी
जब पहली बार मिली थी तुमसे
तुम कहते थे चाँदनी मुझसे
कभी कहते परिधि और
कभी कहते प्यार से बुलबुल
भूली सब प्यारी बातें वो
अब कहते हो मुझे सिर्फ़ मनहूस
क्या कहूँ किसी से जबकि
जानती हूँ मैं कि तुम्हारे
प्यार की धूप अब ढल चुकी

सुबह सुबह

सुबह सुबह जब उसने ली अंगड़ाई

गालों पर उसके जैसे छाई अरुणाई

आदित्य ने गालों से जुल्फ़ें सिमटाई

चहुँ और लालिमा अपनी है बिखराई

देख पवन भी उन्मुक्त गगन में मानो

उसकी ज़ुल्फ़ों की छटा ने घटा फैलाई

हैरान हूँ मैं ये सोचकर कि मालिक ने

क़ायनात् कितनी फ़ुर्सत से है बनाई

जाने क्या उसके मन में समाई और

उसने ये प्रकृति हमारे लिए बनाई

सोमवार, 5 जुलाई 2021

शौक

बहुत शौक था तुम्हें

मुझे ख़ुद से दूर करने का

शौक था इसलिए पूरा किया

आदत होती तो बदल देती

तुम अलग मैं अलग

सबसे अलग सबसे जुदा थी

मौन अलग और बोल अलग

ख़ुद की हर बात पे फ़िदा थी

तुम नहीं समझोगे

तुमने देखा ही कहाँ

कभी मेरी तरफ़ मुड़कर

देखते तो पाते मुझे अलग

औरों की तरह मुझे भी

ग़लत समझ लिया तुमने

अब वक़्त नहीं है

समझने समझाने का

अब जियो तुम अलग

और मैं अलग

चला जाता है

जो चला जाता है वो वापस क्यों नहीं आता

उसका मन नहीं करता या आया नहीं जाता

जाने वालों के बिना हमसे रहा नहीं जाता

कैसे कहें कि उनके बिना जिया नहीं जाता

जाने वाले हो सके तो लौट कर आना

ऐसे भी कोई जाता है कि जाने के बाद

दोबारा लौट कर आया नहीं जाता

सवेरा उम्मीदों से भरा

कभी कभी सुबह का सवेरा उम्मीदों से भरा और

साँझ का संझेरा नाउम्मीदों से भरा बन जाता है

कभी सुबह का जोश, उजाला कम होते कम होता है

कभी साँझ ढलते ढलते खत्म होने को खत्म हो जाता है

आ गयी हूँ मैं जिस राह पर चलते चलते यहाँ तक

प्रभु उसी पर मुझे चलाये रखना कभी ना गिरने देना

कभी डगमगाऊँ हिम्मत हारूँ तो तुम आकर थाम लेना

साहिल दूर सही कितना भी कभी ना मुझको डूबने देना

सफ़र लंबा मंज़िल ऊँची बाँह मेरी तुम पकड़े रहना

राह मुश्किल रास्ते दुर्गम कभी ना मुझको डिगने देना

थक हार कर कभी जो बैठूँ नई उम्मीद तुम आकर भर देना

डूबते ढलते अंधियारे की तरफ़ नहीं,

बढ़ते उम्मीदों के उजाले की तरफ़ चलाये रखना

पंछी जब लौटते हैं अपने घोंसले घरौंदों की ओर

देख उन्हें ये मेरा मन भी चाह से भर जाता है 

सोचने को मजबूर हो जाती हूँ कि कब कम होंगे ये

राह के कांटे और पथरीले संकरे रास्तों के कठिन सफ़र पे

है उस दिन की प्रतीक्षा जब मैं लौटूँ मैं भी अपने नीड़ में

बने रहना चलते रहना साथ मेरे जब तक ना पहुँचूँ अपनी मंज़िल पे

मंज़िल से ध्यान ना भटकने देना चातक की तरह निहारूँ मैं

चाहे थकी हूँ हार मानी हूँ चाहे छाले भरे हों पाँव में

बैठी हूँ मैं ध्यान लगाए देखूँ तुझे इसी उम्मीद से

कि शायद मैं भी सुकून की ठंडी सांस लूँ अपने घर तुम्हारी छाँव में

वो रात कैसे गुज़री

वो रात कैसे गुज़री मत पूछ मेरे बेवफ़ा हमसफ़र

जाने कितनी ही सैकड़ों रातों पर भारी थी वो एक रात

कलेजा मुँह को आता था कदम ना बाहिर उठते थे

भारी मन वजनी कदमों से तेरी चौखट सदा के लिए

ना चाहते हुए भी लांघी थी मैंने, पर ना रोका तुमने

अपने घर से निकाले जाने की व्यथा तुम क्या जानोगे

जिसने कभी ना अपना घोंसला छोड़ा, ना छोड़ी कभी डाली

रात सुनसान अकेली थी वो, नन्हीं जान मेरे साथ थी

वो अंधियारी काली अमावस से गहरी काली रात थी 

उस रात सड़क पर कुत्ते कम दरिंदे ज्यादा दिखते थे

कदम ना उठते थे आगे, जाने क्या मन में सोचती थी

एक कदम आगे रखती थी, एक बार पीछे मुड़कर देखती थी

देखती थी वो बंद किवाड़ें, जिन पर हुआ था स्वागत मेरा

जिन पर लगी थी कभी मेहंदी वाले हाथों से हल्दी की थापें

एकटक खड़ी इंतज़ार करती थी कि कुछ जाने पहचाने

शब्द और आवाज़ मेरे बढ़ते रुकते कदमों को विराम देंगें

पर अफ़सोस ऐसा हुआ नहीं, जो हुआ वो कभी सोचा नहीं

आखिरकार छोड़ पी का घर, बाबुल के आंगन वापस चली

कभी कभी कितना मन होता है अपनी देहरी पूजने और

अपना घर गली आंगन लीपने और पूरने रंगोली बनाने का l

ए मन उदास ना हो निराश ना हो वो मौका भी जल्द होगा

जब मैं घर के अंदर मेरा बुरा चाहने वाला घर के बाहर होगा

इंतज़ार है मुझे उस दिन का इंसाफ तू ज़रूर करेगा 

बिन आवाज़ की लाठी से हिसाब करेगा तू वार करेगा

ज़िंदगी के छोर पर

ज़िंदगी के छोर पर जो तुम मिल गए किसी मोड़ पर

बात करोगे नज़रंदाज़ करोगे या देखते रहोगे देखकर

चाहे जो मन करे वो तुम करना ये छोड़ा है तुम पर

मिल जाएँ जो राह पर शायद तुम कुछ देर रुकोगे

चौंक जाओगे या कुछ ठिठकोगे अनायास देख कर

शायद तुम नज़रें फेरोगे लेकिन ज़रा सोचना मुझे देखकर

क्या तुम कुछ ऐसा करोगे या तुमको कुछ याद आयेगा

कुछ सोचकर चिंता छा जायेगी तुम्हारे ललाट पर 

करीब आकर आँखें डाल कर देखोगे तुम मेरे चेहरे पर

धीरे से तुम हाथ बढ़ा कर रख दोगे अपना हाथ मेरे हाथ पर

शायद तुम उदास होगे या कुछ मुस्कुराओगे थोड़ा रुक कर

इनमें से ऐसा ही कुछ करोगे यकीं है मुझे पूरा तुम पर

उम्मीद है शायद तुम कुछ और करोगे यूँ अचानक मुझे देख कर

पढ़ेगा कौन

मेरा लिखा पढ़ेगा कौन
सारी दुनिया ख़ुद में मौन
मैं भी मौन तुम भी मौन
जानता है किसको कौन
सबके हाथ में रहता फोन
मेरा लिखा पढ़ेगा कौन
मैं कौन और तुम कौन
हाल पूछता किसके कौन
दूसरों के दिल को टटोले कौन
मैं भी मौन तुम भी मौन

सोमवार, 28 जून 2021

मैंने कब कहा था

मैंने कब कहा था तुमसे मुझे उपहार चाहिए
मैंने कब कहा था तुमसे मुझे श्रृंगार चाहिए
मैंने कब कहा था तुमसे मुझे फूलों का हार चाहिए
मैंने कब कहा था तुमसे मुझे महलों का राज चाहिए
मैंने कब कहा था तुमसे मुझे ऐशोआराम चाहिए
मुझे नहीं चाहिए तुमसे कोई महल धन दौलत
मुझे तो बस प्यार से सींचा हुआ घर परिवार चाहिए
मुझे तो बस हर पल तुम्हारा साथ अपने साथ चाहिए
मुझे तो बस हर पल तुम्हारा संग सहारा अधिकार चाहिए
तुम्हें बस अपना कह सकूँ इतना सा अधिकार चाहिए
मुझे तो बस अपने लिए तुमसे थोड़ा सा प्यार चाहिए

रविवार, 27 जून 2021

औरों की तरह मुझे भी

सबसे अलग सबसे जुदा थी

मौन अलग और बोल अलग

ख़ुद की हर बात पे फ़िदा थी

तुम नहीं समझोगे

तुमने देखा ही कहाँ

कभी मेरी तरफ़ मुड़कर

देखते तो पाते मुझे अलग

औरों की तरह मुझे भी

ग़लत समझ लिया तुमने

अब वक़्त नहीं है

समझने समझाने का

अब जियो तुम अलग

और मैं अलग

ख़ुद से दूर

बहुत शौक था तुम्हें

मुझे ख़ुद से दूर करने का

शौक था इसलिए पूरा किया

आदत होती तो बदल देती

ख़ाक

सब कुछ जानकर मेरे बारे में

उसने मुझे ख़ाक कर दिया

ज़िंदगी एक साज़

कहना नहीं किसी से

मांगना नहीं किसी से

साथ मांगेंगे तो सौदा करेंगे

बिताए पलों का हिसाब करेंगे

गले लग कर गला काटने का रिवाज़ है 

बच कर रहना हर बगल और हर ज़ुबान में

छुरी रखने का रिवाज़ है

अकेले ही चलो तो ज़िंदगी एक साज़ है

ऐ कामयाबी

तुम्हें छूकर देखना है

मुझे ये मोजिज़ा देखना है

क्यों तुझे पाकर इंसान

अक्सर अपने होश खो देता है

दिल पर वार

तुम्हारी बातें मेरे दिल पर खंज़र से वार करती हैं

घाव बेशक़ गहरे हों मग़र नासूर बना देती हैं

आँख केआँसू

ज़िंदगी कुछ ऐसे दौर में आ गयी है कि

गालों से लुढ़कते आँसुओं को छिपाना है

पानी भले ही आँखों में तैर जाए लेकिन

ध्यान रहे बाहर ना आने पाए

इन्हें समझा दिया है मैंने कि भीड़ में नहीं

अकेले में ही मिलने आया करो

कोई आँख केआँसू  पी जाता

ऐसी मेरी तकदीर नहीं है 

तक़दीर बड़ी किस्मत वालों की हुआ करती है

तब ना दिल टूटता ना आँख रोती

नज़र का धोखा

उसका प्यार मेरी नज़र

का धोखा था

दिल तोड़ने का उसके पास 

भरपूर मौका था

टूटी हुई औरतें

ये टूटी दिखती औरतें अंदर से बहुत मजबूत होती हैं l

इनकी सहनशीलता औरों से अद्द्भुत अद्वितीय होती है l

मन में उठते बैठते भावों को ढकने में ये माहिर होती हैं l

हरदम हरपल टूटते ख्वाबों को दिल में ही दफ़न करती हैं l

एक कब्रगाह मन में और बाहर चमन रखती हैं l

बाहर से दिखती तितली जैसी और अंदर से लाश ढोती हैं l

कभी थी पापा की लाड़ली अब मनहूस कहलाती हैं l

कभी पलकों पर रहने वाली अब रोज़ पीटी जाती हैं l

महलों में रहने वाली अब रोज़ घर से निकाली जाती हैं l

खुद कभी राम बन ना सकोगे मुझमें सीता ढूंढी जाती हैं l

चलती रहेगी ऐसे ही क्यों किसी से ना ये बदली जाती है l

कितनी ही आई और चली गयी ये कहानी यूँ ही चलती जाती है l

ज़िंदगी की अदालत

एक रोज़ ज़िंदगी की अदालत में तेरी पेशी होगी

तेरी उसकी आमने सामने मुलाक़ात होगी

कर्म का लेखा जोखा तेरा होगा सज़ा उसकी होगी

गुनाह तेरे होंगे तो सज़ा भी तुझे झेलनी होगी

बिन मुहूर्त के अदालत की तारीख मुक़र्रर होगी

वकालतनामा भी दे ना सकोगे सिर्फ पेशी तुम्हारी होगी

सवाल जवाब तुमसे होंगे मर्ज़ी उस खुदा की होगी

वक़्त है संभल जा वरना देरी भी जल्दी में तब्दील होगी

ज़िंदगी की अदालत में जल्दी ही तेरी पेशी होगी

शुक्रवार, 25 जून 2021

मेरा चाँद

तुम ही से मेरा चाँद खिले
तुम ही से चांदनी मिले तुम ही से सुबह हो मेरी
तुम ही से मेरी शाम ढले तुम ही से महके हर कलि
तुम ही से हर फूल खिले तुम ही तो अपने हो मेरे
तुम ही से हैं सुबह गिले तुम ही तो चाहत हो मेरी
तुम ही से मेरा दिल मिले तुम ही से ज़िन्दगी है मेरी
तुम ही से हैं यह सिलसिले जब तुझ ही से मुझे सुब कुछ मिले
फिर कियों मुझ को तुम मिले?

वो कोई और बात थी

तुमसे मिलना और मिलकर बिछड़ना

कहने को सामान्य सी बात थी l

मिलने का तो ठीक बिछड़ने की वो कोई और बात थी l

कारण जो तुमने दिया सही था

पता नहीं क्यों बार बार ऐसा लगता है कि वो कोई और बात थी l

लौट कर वापस नहीं आये

इसलिए लगता है वो कोई और बात थी l

आते तो कभी ना लगता

कि वो कोई और बात थी l

वो रात

नहीं भूलती कभी वो रात 

थी कुछ अलग बाकी रातों से वो रात

ऐसी नहीं थी कोई बड़ी बात

पर जाने कैसे बन गयी बिन बात वो बात

नहीं कही जाती थी किसी से

दिल पर लगी थी एक बड़ी घात

अनायास नहीं था शायद कुछ भी

शायद बिछाई थी तुमने पहले से कोई बिसात

नहीं जानती थी मैं यह सब

लगा था दिल को एक बड़ा आघात

नहीं भूलेगी ना हि मिटेगी

दिल ओ दिमाग़ से वो एक रात....

ऐ मेरे प्यारे बिस्तर

तुम सा ना कोई सच्चा हमसफर ऐ मेरे प्यारे बिस्तर, 

सुकून मिलता है जब मिलते हम तुम गले लगकर l

जब रहता दिल दिमाग़ चलयमान और विचलित, 

तब नहीं सूझता कुछ भी किंचित् l

निंदिया रानी भी रहती आँखों से कोसों दूर, 

और ख्यालों में ही चलते, जाने निकल जाते कितनी दूर l

नींद ना होती पूरी जब भी, दिल भी रहता हरदम बेचैन, 

आँखों में छाती लालिमा नहीं रहता शरीर को भी जुनून, 

जब सोते आकर तुम पर, तब आता तुम को भी सुकून l

करना चाहते तब तुम बातें, पर निंदिया ले जाती मुझको, 

तुमसे सपनों में बहुत दूर........ 

तुम सा ना कोई सच्चा हमसफर ऐ मेरे प्यारे बिस्तर.....

जो तुमने किया

 जो तुमने किया मेरे साथ, 

गर वो मैंने किया होता, 

तो देखा नहीं जायेगा तुमसे l

जो हालात पैदा किये तुमने, 

गर वो मैंने किये होते

तो सहा नहीं जायेगा तुमसे l

जो किया हमारे साथ तुमने, 

वो किसी से कहा नहीं जायेगा तुमसे l

जो ढा रहे हो हम पर जुल्म इतने, 

हमारा तो ठीक, 

पर भगवान का सामना किया ना जायेगा तुमसे l

विरोधाभास

 देख विरोधाभास जगत के, 

         आँख मेरी जब नम होती है l

मन की बातें कहने का तब, 

         कविता ही माध्यम होती है ll

एक बात कहनी थी

 तुमसे एक बात कहनी थी

हम पर कैसे गुज़री रातें तुम बिन, 

वो बात गहरी थी l

बेशक़ तुम समझ ना सकोगे, 

फिर भी तुमसे ही कहनी थी, 

तुमसे एक बात कहनी थी llll

माँ

माँ को क्या लिखूँ मैं, उसकी एक रचना हूँ । 

माँ को क्या रंगूँ मैं, उसकी एक कला हूँ ।

माँ से क्या कहूँ मैं, उसने मुझे समझा है । 

जो कभी कहा नहीं मैंने, उसने वो सुना है । 

माँ को क्या गढूँ मैं, उसने मुझे जड़ा है । 

माँ को क्या पुकारूँ मैं, वो हर पल मेरे साथ है। 

माँ से क्या क्षमा माँगू मैं, बिन मांगे क्षमा किया है। 

मेरी त्रुटियाँ अक्षम्य हैं,  मैंने किया और उसने सहा है । 

मुझे क्षमा कर दो माँ , मुझे क्षमा कर दो माँ । 

सालगिरह

आज ही के दिन मैंने तुम्हें पाया 

और पाया था तुमने मुझे l

बीते ग्यारह वर्ष विगत मानो, 

बीते हों ग्यारह जनम जानो.

खड़े थे हम तुम सजे इक दूजे के विमुख, 

चहुँ ओर थी भीड़ और छाई थी खुशहाली, 

कहीं बजा रहा था गीत और कहीं संगीत, 

फिर भी मन में भरा था जाने कितना दुख l

खड़ी थी तुम्हारे सम्मुख फिर भी खड़ी ना थी, 

जाने किन विचारों में थी खोई.

आँखें और मन हो व्याकुल ढूंढ रहे थे माँ को, 

जो आत्मा से मेरे पास थी, पर शरीर से मेरे पास ना थी.

मन भरा हुआ था अगिनत पीड़ा और दुख से, 

नहीं कह पा रही थी कि बाबुल मत भेजो अपने आंगन से, 

भरी और डबडबाई आँखें देख रही थी बाबुल को, 

और एक पल देखती थी प्रियवर को l

मन चिंता और शंकाओं के सागर में गोते लगाता था, 

कि क्या यह समझेगा मुझे और जन्मों के हमारे रिश्ते को l

आस

कैसे कह दूँ कि आज भी तुमसे प्यार नहीं है, 

इन आँखों को अब भी तुम्हारा इंतज़ार नहीं है l

बँधी हूँ तुमसे तो बन्धन हमेशा रहेगा, 

प्यार है तुमसे तो संग भी सदा रहेगा l

साक्षात् में तुम मेरे पास नहीं, 

पर आत्मा से तुम कभी अलग नहीं l

अंश है तुम्हारा मेरे पास, 

फिर क्यों ना होगी तुमसे मिलन की आस l

तुम बिन उदासी है हर तरफ इधर, 

इक उम्मीद दिखती है देखती हूँ मुड़कर जिधर l

दिख जाए शायद कहीं तुम्हारी एक झलक, 

नहीं पाती जब तुम्हें कहीं, बैठ जाती हूँ इक तरफ l

जन्मों का पता नहीं, इस जन्म का संग था हमारा, 

मैंने चाहा, पर तुमने कभी ना समझना चाहा l

अपना घोंसला छोड़ कर चिड़िया कब आबाद हुई है, 

खुले आसमां के नीचे वो हरपल बरबाद हुई है l

अपनी खुशियाँ वह घोंसले में ही पाती है, 

जहाँ दुखी होने पर भी वह खुशी के गीत गाती है l