रविवार, 27 जून 2021

औरों की तरह मुझे भी

सबसे अलग सबसे जुदा थी

मौन अलग और बोल अलग

ख़ुद की हर बात पे फ़िदा थी

तुम नहीं समझोगे

तुमने देखा ही कहाँ

कभी मेरी तरफ़ मुड़कर

देखते तो पाते मुझे अलग

औरों की तरह मुझे भी

ग़लत समझ लिया तुमने

अब वक़्त नहीं है

समझने समझाने का

अब जियो तुम अलग

और मैं अलग

ख़ुद से दूर

बहुत शौक था तुम्हें

मुझे ख़ुद से दूर करने का

शौक था इसलिए पूरा किया

आदत होती तो बदल देती

ख़ाक

सब कुछ जानकर मेरे बारे में

उसने मुझे ख़ाक कर दिया

ज़िंदगी एक साज़

कहना नहीं किसी से

मांगना नहीं किसी से

साथ मांगेंगे तो सौदा करेंगे

बिताए पलों का हिसाब करेंगे

गले लग कर गला काटने का रिवाज़ है 

बच कर रहना हर बगल और हर ज़ुबान में

छुरी रखने का रिवाज़ है

अकेले ही चलो तो ज़िंदगी एक साज़ है

ऐ कामयाबी

तुम्हें छूकर देखना है

मुझे ये मोजिज़ा देखना है

क्यों तुझे पाकर इंसान

अक्सर अपने होश खो देता है

दिल पर वार

तुम्हारी बातें मेरे दिल पर खंज़र से वार करती हैं

घाव बेशक़ गहरे हों मग़र नासूर बना देती हैं

आँख केआँसू

ज़िंदगी कुछ ऐसे दौर में आ गयी है कि

गालों से लुढ़कते आँसुओं को छिपाना है

पानी भले ही आँखों में तैर जाए लेकिन

ध्यान रहे बाहर ना आने पाए

इन्हें समझा दिया है मैंने कि भीड़ में नहीं

अकेले में ही मिलने आया करो

कोई आँख केआँसू  पी जाता

ऐसी मेरी तकदीर नहीं है 

तक़दीर बड़ी किस्मत वालों की हुआ करती है

तब ना दिल टूटता ना आँख रोती

नज़र का धोखा

उसका प्यार मेरी नज़र

का धोखा था

दिल तोड़ने का उसके पास 

भरपूर मौका था

टूटी हुई औरतें

ये टूटी दिखती औरतें अंदर से बहुत मजबूत होती हैं l

इनकी सहनशीलता औरों से अद्द्भुत अद्वितीय होती है l

मन में उठते बैठते भावों को ढकने में ये माहिर होती हैं l

हरदम हरपल टूटते ख्वाबों को दिल में ही दफ़न करती हैं l

एक कब्रगाह मन में और बाहर चमन रखती हैं l

बाहर से दिखती तितली जैसी और अंदर से लाश ढोती हैं l

कभी थी पापा की लाड़ली अब मनहूस कहलाती हैं l

कभी पलकों पर रहने वाली अब रोज़ पीटी जाती हैं l

महलों में रहने वाली अब रोज़ घर से निकाली जाती हैं l

खुद कभी राम बन ना सकोगे मुझमें सीता ढूंढी जाती हैं l

चलती रहेगी ऐसे ही क्यों किसी से ना ये बदली जाती है l

कितनी ही आई और चली गयी ये कहानी यूँ ही चलती जाती है l

ज़िंदगी की अदालत

एक रोज़ ज़िंदगी की अदालत में तेरी पेशी होगी

तेरी उसकी आमने सामने मुलाक़ात होगी

कर्म का लेखा जोखा तेरा होगा सज़ा उसकी होगी

गुनाह तेरे होंगे तो सज़ा भी तुझे झेलनी होगी

बिन मुहूर्त के अदालत की तारीख मुक़र्रर होगी

वकालतनामा भी दे ना सकोगे सिर्फ पेशी तुम्हारी होगी

सवाल जवाब तुमसे होंगे मर्ज़ी उस खुदा की होगी

वक़्त है संभल जा वरना देरी भी जल्दी में तब्दील होगी

ज़िंदगी की अदालत में जल्दी ही तेरी पेशी होगी