सोमवार, 6 दिसंबर 2021

" ज़ख़्मों को अब मत कुरेद "

कभी आँसू कभी ख़ुशी बेची, ना चाहते हुए भी खिलखिलाती रही

तन मन मारा गया, मेरा बचपन नोंचा गया कभी लूटा खसोटा गया

रही बहुत बार ना नुकर करती, कभी धकेलती कभी चेहरा नोंचती

मग़र बद किस्मती से कभी बख़्शी ना गई, तन हर बार बिखेरा गया

घाव तो समय के साथ भर गए मग़र आत्मा छलनी हुई कभी ना भरी

क्या ज़िंदगी भर कीमत चुकानी पड़ेगी इस किरदार और वज़ूद की

अंजाने में सज़ा ये कैसी मुकर्रर की ए ख़ुदा तुमने इस औरत ज़ात की

जाने कब तलक झेलेगी और चुकायेगी परेशानी इस तन के साथ की

अब बस भी कर इन ज़ख़्मों को देना, अब और इन्हें नासूर ना बना

हिम्मत अब जवाब दे गयी है, मत कुरेद इन्हें, अब भर भी जाने दे

चैन से जी नहीं सकती तो कोई बात नहीं, सुकून से मर तो जाने दे

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